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यूपी में कब्रिस्तान भूमि के सर्वे पर हाईकोर्ट ने रोक से किया इनकार, कहा– राजस्व टीम के सामने दर्ज कराएं आपत्ति

Published on: January 1, 2026
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जागृत भारत | प्रयागराज(Prayagraj): इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल जिले के कोट (अंदर चुंगी) गांव स्थित गाटा संख्या 32/2 की पैमाइश और सर्वेक्षण की कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। अदालत ने साफ कहा है कि यदि किसी पक्ष को आपत्ति है तो वह राजस्व टीम के समक्ष सर्वे के दौरान अपनी आपत्ति दर्ज करा सकता है

राजस्व सर्वे पर रोक लगाने से हाईकोर्ट का इनकार

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवादित आदेश केवल भूमि की पैमाइश और सीमांकन से संबंधित है। इसमें किसी भी प्रकार की बेदखली या स्वामित्व परिवर्तन की कार्यवाही नहीं की जा रही है। ऐसे में इस स्तर पर न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

खंडपीठ ने याचिका का किया निस्तारण

यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव मिश्रा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने पारित किया। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को निर्देश देते हुए याचिका को अंतिम रूप से निस्तारित कर दिया।

एसडीएम के आदेश को दी गई थी चुनौती

असीम खान सहित 16 अन्य याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर संभल एसडीएम द्वारा दिसंबर 2025 में जारी आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश में गाटा संख्या 32/2 की पैमाइश और सीमांकन के निर्देश दिए गए थे।

याचिकाकर्ताओं का दावा: कब्रिस्तान भूमि है विवादित स्थल

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि संबंधित भूमि सरकारी रिकॉर्ड में कब्रिस्तान के रूप में दर्ज है। उनका तर्क था कि इस भूमि पर किसी भी प्रकार की कार्यवाही सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों का उल्लंघन है।

राज्य सरकार की ओर से क्या दलील दी गई

मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने राज्य की ओर से पक्ष रखते हुए कहा कि विवादित भूमि भले ही कब्रिस्तान के रूप में दर्ज हो, लेकिन सरकार द्वारा केवल पैमाइश और सीमांकन का कार्य कराया जा रहा है। इससे याचिकाकर्ताओं के अधिकारों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

सड़क निर्माण को लेकर जताई गई आपत्ति

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने अदालत में यह भी दलील दी कि एक सड़क बनाकर कब्रिस्तान भूमि का अवैध रूप से बंटवारा किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि पैमाइश की कार्रवाई एक विशेष समुदाय को वहां से हटाने के उद्देश्य से की जा रही है।

कोर्ट की टिप्पणी: केवल मापन और सीमांकन का मामला

हाईकोर्ट ने सभी दलीलों को सुनने के बाद कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला केवल भूमि के मापन और सीमांकन से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को राजस्व अधिकारियों के सामने अपनी आपत्ति रखने की स्वतंत्रता देते हुए याचिका का निस्तारण कर दिया।

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