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“मतदाता सूची में पारदर्शिता रखें, हटाए गए नामों की जानकारी सार्वजनिक करें”: सुप्रीम कोर्ट की चुनाव आयोग को फटकार

Published on: October 8, 2025
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नई दिल्ली – सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को चुनाव आयोग (ECI) को कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि लोकतंत्र की पहचान पारदर्शिता और सूचना की उपलब्धता में निहित है। अदालत ने बिहार की अंतिम मतदाता सूची पर सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर उन मतदाताओं की पहचान क्या है जिनके नाम अंतिम सूची में जोड़े गए हैं — क्या वे वही लोग हैं जिन्हें मसौदा सूची (ड्राफ्ट रोल) से हटाया गया था या फिर ये नए मतदाता हैं?

न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि “अंतिम सूची में संख्या बढ़ी है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं कि जोड़े गए नाम कहां से आए हैं। चुनावी प्रक्रिया पर विश्वास बनाए रखने के लिए यह स्पष्टता आवश्यक है।”


📊 बिहार की मतदाता सूची में गड़बड़ी के संकेत

बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के बाद जारी अंतिम मतदाता सूची में 7.42 करोड़ मतदाता दर्ज किए गए हैं।
जबकि मसौदा सूची में यह संख्या 7.24 करोड़ थी, जिसमें पहले के 7.89 करोड़ मतदाताओं में से 65 लाख नाम हटाए गए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि अंतिम सूची में बढ़ोतरी किन नामों की वजह से हुई है — क्या ये 65 लाख में से कुछ को फिर जोड़ा गया है या पूरी तरह नए नाम शामिल हुए हैं?

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⚖️ “हटाए गए मतदाताओं को सूचना दी गई या नहीं?”

पीठ ने यह भी पूछा कि जिन 3.66 लाख मतदाताओं के नाम अंतिम सूची से हटाए गए, क्या उन्हें व्यक्तिगत रूप से इसकी सूचना दी गई ताकि वे अपील दाखिल कर सकें।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “हर व्यक्ति को अपील का अधिकार है। क्या चुनाव आयोग ने हटाए गए मतदाताओं की सूची सार्वजनिक की?”

न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची ने नियम 21A, मतदाता पंजीकरण नियम 1960 का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी सूची जिला निर्वाचन कार्यालयों के सूचना बोर्डों पर प्रदर्शित की जानी चाहिए थी।


🗂️ चुनाव आयोग का जवाब

चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि ज़मीनी स्तर से आंकड़े एकत्र किए जा रहे हैं और अब तक किसी भी मतदाता ने शिकायत दर्ज नहीं कराई है। उन्होंने कहा कि अंतिम मतदाता सूची राजनीतिक दलों के साथ साझा की जा चुकी है।

उन्होंने कहा, “मसौदा सूची और अंतिम सूची की तुलना करके यह देखा जा सकता है कि कौन हटाया गया और कौन जोड़ा गया है।”

इस पर न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता वकील प्रशांत भूषण से कहा, “लेकिन आप जिन लोगों की ओर से बोल रहे हैं, वे कहां हैं? ड्राफ्ट और फाइनल सूची वेबसाइट पर हैं, आप तुलना कर सकते हैं। क्या आपके पास कोई ठोस उदाहरण है कि किसी का नाम बिना सूचना के हटाया गया हो?”


🧾 प्रशांत भूषण ने लगाए गंभीर आरोप

वकील प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की अपारदर्शी प्रक्रिया ने मतदाता सूची में गहरी गड़बड़ी पैदा की है।
उनकी लिखित याचिका में कहा गया है कि सितंबर 2025 में बिहार की वयस्क आबादी का अनुमान 8.22 करोड़ था, लेकिन अंतिम सूची में केवल 7.42 करोड़ मतदाता दर्ज हैं — यानी लगभग 80 लाख लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित किया गया है, जो राज्य की वयस्क आबादी का करीब 10% है।

उन्होंने कहा, “भारत में किसी भी राज्य में इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं को कभी सूची से बाहर नहीं किया गया। इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं और मुस्लिम मतदाता गायब हैं।”

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👩‍🦱 महिलाएं और मुस्लिम मतदाता सूची से ‘गायब’

भूषण ने अदालत को बताया कि सितंबर 2025 में बिहार की लैंगिक अनुपात (Gender Ratio) 934 थी, जबकि अंतिम मतदाता सूची में यह घटकर 892 रह गई — यानी करीब 17 लाख महिलाएं सूची से बाहर हो गईं।
उन्होंने कहा, “इससे पिछले एक दशक में मतदाता सूची में हुए सुधार मिट गए हैं।”

भूषण के अनुसार, नाम पहचान सॉफ्टवेयर से किए गए विश्लेषण में पाया गया कि ड्राफ्ट सूची से हटाए गए 65 लाख मतदाताओं में 25% मुस्लिम थे, जबकि अंतिम सूची से हटाए गए 3.66 लाख मतदाताओं में 34% मुस्लिम हैं — यानी लगभग 6 लाख मुस्लिम मतदाता बाहर कर दिए गए।


🔍 डुप्लीकेट और त्रुटिपूर्ण प्रविष्टियों पर सवाल

भूषण ने यह भी कहा कि अंतिम मतदाता सूची में 5.17 लाख डुप्लीकेट नाम, 2.5 लाख अमान्य घर नंबर, 25,000 फर्जी नाम, और 60,000 गलत लिंग या रिश्तों की प्रविष्टियां पाई गई हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह गुरुवार को अगली सुनवाई से पहले इन सभी आरोपों और आंकड़ों पर विस्तृत जवाब दाखिल करे।
अदालत ने कहा कि पारदर्शिता और सूचना तक पहुंच ही लोकतंत्र की आत्मा है, और चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न रहे।


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