पाकिस्तानी सेना के पूर्व ब्रिगेडियर डॉ. राशिद वली जंजुआ ने डॉन में लिखे अपने लेख में कहा है कि पाकिस्तान भारत के खिलाफ उपलब्ध कई अंतरराष्ट्रीय कानूनी विकल्पों का प्रभावी इस्तेमाल करने में सफल नहीं रहा है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद और अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संस्थाओं के जरिए भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की, लेकिन इन रास्तों की अपनी सीमाएं हैं।
अंतरराष्ट्रीय अदालतों में क्यों मुश्किल है पाकिस्तान की राह?
राशिद वली जंजुआ के मुताबिक, पाकिस्तान ने किशनगंगा और रातले जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन का रास्ता अपनाया था। वर्ष 2025 में इस अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र की पुष्टि भी की थी, लेकिन भारत ने इस प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया।
उनका कहना है कि भारत के विरोध के कारण मध्यस्थता से जुड़े किसी फैसले को लागू करवाना पाकिस्तान के लिए बड़ी चुनौती है। ऐसे में केवल फैसला हासिल कर लेना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उसे लागू करवाने की क्षमता भी जरूरी होगी।
UNHRC से भी नहीं मिलेगा बाध्यकारी आदेश
पूर्व ब्रिगेडियर ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद यानी UNHRC के विकल्प पर भी चर्चा की। उनका कहना है कि पाकिस्तान इस मंच पर भारत के खिलाफ मुद्दा उठा सकता है, लेकिन यहां से मिलने वाली रिपोर्ट या सिफारिशें आमतौर पर बाध्यकारी न्यायिक आदेश के रूप में लागू नहीं होतीं।
इस वजह से पाकिस्तान के लिए भारत पर सीधे कानूनी दबाव बनाना मुश्किल होगा। भारत यदि ऐसे किसी निष्कर्ष को स्वीकार नहीं करता है तो उसे लागू करवाने की व्यवस्था भी सीमित रहेगी।
ICJ का रास्ता भी आसान नहीं
लेख में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय यानी ICJ के विकल्प का भी जिक्र किया गया है। पूर्व सैन्य अधिकारी के मुताबिक, भारत ने ICJ के अधिकार क्षेत्र को कुछ शर्तों के साथ स्वीकार किया है। ऐसे में भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि से जुड़े विवाद को सीधे ICJ तक ले जाना उतना सरल नहीं है, जितना पाकिस्तान में आमतौर पर माना जाता है।
उन्होंने यह भी बताया कि 1997 के संयुक्त राष्ट्र जलमार्ग कन्वेंशन से भी तत्काल कोई व्यावहारिक समाधान निकलना मुश्किल है, क्योंकि भारत और पाकिस्तान ने इस कन्वेंशन की पुष्टि नहीं की है।
UNSC और UNGA से मदद की उम्मीद
राशिद वली जंजुआ के मुताबिक, पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद में भी इस मुद्दे को उठा सकता है। वह अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का हवाला देते हुए अंतरिम उपायों या बाध्यकारी प्रस्ताव की मांग कर सकता है। हालांकि, इसके लिए पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाना होगा। यह भी अपने आप में बड़ी चुनौती है।
सिंधु जल संधि को मजबूत करना ही बेहतर रास्ता
पूर्व ब्रिगेडियर ने आखिर में माना कि भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कानूनी घेराबंदी करना आसान नहीं है। उनके अनुसार, पाकिस्तान के सामने उपलब्ध अधिकांश रास्तों में कानूनी और व्यावहारिक सीमाएं हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि पाकिस्तान को केवल भारत के खिलाफ बयानबाजी करने के बजाय सिंधु जल संधि को फिर से मजबूत करने और उसके तहत उपलब्ध कानूनी तंत्र का प्रभावी इस्तेमाल करने पर ध्यान देना चाहिए।
इस तरह पाकिस्तान में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की कड़ी बयानबाजी के बीच उनके ही देश के एक पूर्व सैन्य अधिकारी का यह आकलन महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह स्वीकारोक्ति बताती है कि सिंधु जल संधि के मुद्दे पर भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कानूनी दबाव बनाना पाकिस्तान के लिए बेहद जटिल चुनौती है।