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देवरिया: मेले का बदलता स्वरूप – मनोरंजन कम, व्यापार ज्यादा; सुरक्षा और जेब पर पड़ रहा भारी

Published on: December 31, 2025
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जागृत भारत | देवरिया(Deoria): जनपद में इन दिनों लग रहे मेले लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं, लेकिन उनका स्वरूप अब पहले जैसा पारंपरिक नहीं रह गया है। कभी मेला सामाजिक जुड़ाव, पारिवारिक खुशी, लोकसंस्कृति और खुले मन से घूमने-फिरने का प्रतीक था। तब जेब में कम पैसे होने पर भी लोग पूरे परिवार के साथ मेला घूम आते थे, क्योंकि मेला रौनक, मेलजोल और अपनत्व का एक अनोखा अनुभव देता था।
लेकिन बदलते समय के साथ मेले का रूप अब पूरी तरह व्यावसायिक होता जा रहा है, जहां हर कदम पर खर्च और हर सुविधा की कीमत तय है।

फिलहाल देवरिया में चीनी मिल ग्राउंड और महाराजा अग्रसेन कॉलेज परिसर में मेले लगे हैं। इन दोनों स्थानों पर प्रवेश शुल्क ₹20 रखा गया है। वहीं दोपहिया और चारपहिया वाहनों की पार्किंग के लिए अतिरिक्त ₹20 शुल्क लिया जा रहा है। मेला परिसर के अंदर खाने-पीने, खिलौनों और खरीदारी की तमाम वस्तुओं के दाम बाजार से काफी ज्यादा हैं, जिससे आम और मध्यमवर्गीय परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ता दिखाई दे रहा है।

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कई लोगों का कहना है कि मेले की रौनक देखने की इच्छा तो आज भी है, लेकिन लगातार बढ़ते खर्च के चलते परिवार के साथ मेला घूमना अब पहले जैसा सहज और संभव नहीं रह गया है। दूसरी ओर आयोजक दावा करते हैं कि बिजली, सफाई, सुरक्षा और स्टाफ सहित बढ़ते संचालन खर्च की वजह से शुल्क लेना उनकी मजबूरी है।

मेले में लगे बड़े झूले, इलेक्ट्रिक टॉय ट्रेन और विभिन्न मनोरंजन साधन बच्चों और युवाओं को खूब आकर्षित कर रहे हैं, लेकिन इन उपकरणों की तकनीकी जांच और सुरक्षा मानकों पर सवाल खड़े हो रहे हैं। किसी भी तरह की कमी गंभीर हादसे का कारण बन सकती है, इसलिए लोगों की चिंता बढ़ी हुई है।

इसके साथ ही मेले की वजह से आसपास की सड़कों पर जाम की स्थिति भी देखने को मिल रही है। खासतौर पर देवरिया ओवरब्रिज पर लोग खड़े होकर मेले का नजारा देखते हैं, जिससे ट्रैफिक बाधित होता है और दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि भीड़ प्रबंधन और ट्रैफिक नियंत्रण पर और अधिक ध्यान देने की जरूरत है।

सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक अनुमति को लेकर है। मेले किस शर्त पर लगाए गए हैं, सुरक्षा मानदंड क्या हैं और रोजाना की निगरानी किस तरह हो रही है—इस संबंध में कोई स्पष्ट और सार्वजनिक जानकारी नजर नहीं आती। ऐसे में पारदर्शिता और नियमित निरीक्षण बेहद जरूरी हो जाते हैं।

कुल मिलाकर, देवरिया का मेला आज भी लोगों के उत्साह का केंद्र है, लेकिन इसके साथ जुड़े आर्थिक बोझ, सुरक्षा और यातायात जैसे मुद्दों पर संतुलित व जिम्मेदार व्यवस्था की सख्त जरूरत है। तभी मेला एक बार फिर वही बनेगा—जहां बिना डर और दबाव के हर परिवार सुरक्षित और निश्चिंत होकर आनंद ले सके।


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