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High Court: पत्नी के भरण-पोषण में वृद्धि को सही ठहराया, हाईकोर्ट ने पति की पुनरीक्षण अर्जी की खारिज

Published on: January 15, 2026
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जागृत भारत | प्रयागराज(Prayagraj): इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी के भरण-पोषण की राशि में वृद्धि को सही ठहराते हुए पति की पुनरीक्षण अर्जी खारिज कर दी है। यह अर्जी शाहजहांपुर निवासी सुरेश चंद्र की ओर से दाखिल की गई थी, जिसमें उन्होंने परिवार न्यायालय द्वारा 26 जुलाई 2024 को पारित आदेश को चुनौती दी थी।

परिवार न्यायालय ने 500 से बढ़ाकर 3000 रुपये किया था भरण-पोषण

परिवार न्यायालय ने पति द्वारा पत्नी को दिए जाने वाले गुजारा-भत्ते को 500 रुपये से बढ़ाकर 3000 रुपये प्रति माह करने का आदेश दिया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पति ने खुद को मजदूर बताकर भरण-पोषण बढ़ोतरी को बताया अनुचित

याची की ओर से अदालत में दलील दी गई कि वह एक मजदूर है और बड़ी कठिनाई से अपना जीवनयापन करता है। अधिवक्ता ने कहा कि परिवार न्यायालय ने तथ्यों पर समुचित विचार किए बिना भरण-पोषण की राशि बढ़ा दी, जो अत्यधिक और अनुचित है।

राज्य सरकार ने महंगाई के मद्देनजर आदेश को बताया उचित

राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने याची की दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि वर्तमान समय में बढ़ती महंगाई को देखते हुए 3000 रुपये प्रतिमाह की राशि किसी भी दृष्टि से अधिक नहीं कही जा सकती।

पति के स्वस्थ होने को कोर्ट ने माना महत्वपूर्ण तथ्य

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मदनपाल सिंह की एकल पीठ ने कहा कि पति पूरी तरह स्वस्थ है। यदि वह मजदूरी भी करता है, तो 600 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से वह लगभग 18 हजार रुपये प्रति माह कमा सकता है।

पत्नी स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ—हाईकोर्ट

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड से यह तथ्य सामने आता है कि पत्नी स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है। ऐसे में पति का यह धार्मिक और कानूनी दायित्व है कि वह अपनी पत्नी का समुचित भरण-पोषण करे।

सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसलों का दिया गया हवाला

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के रजनेश बनाम नेहा और कल्याण डे चौधरी बनाम रीता डे चौधरी मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि सामान्यतः भरण-पोषण की राशि पति की शुद्ध आय का लगभग 25 प्रतिशत हो सकती है।

तीन हजार रुपये भरण-पोषण को नहीं माना गया अधिक

इन न्यायिक मानकों के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि पति की संभावित आय को देखते हुए पत्नी को 3000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण दिया जाना किसी भी स्थिति में अधिक नहीं कहा जा सकता।

पुनरीक्षण अर्जी खारिज, परिवार न्यायालय का आदेश बरकरार

सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पति की पुनरीक्षण अर्जी खारिज कर दी और परिवार न्यायालय के आदेश को पूरी तरह सही और वैध ठहराया।

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