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यूपी में होमियोपैथी दवाओं की खरीद में घोटाला : 15 गुना महंगी खरीदी गईं होम्योपैथिक दवाएं, जेम टेंडर ने खोली सरकारी खरीद की परतें

Published on: December 21, 2025
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जागृत भारत | प्रयागराज(Prayagraj): उत्तर प्रदेश में होम्योपैथिक दवाओं की सरकारी खरीद को लेकर बड़ा घोटाला सामने आया है। जेम पोर्टल पर जारी टेंडर दस्तावेजों की पड़ताल में खुलासा हुआ है कि प्रदेश में वही होम्योपैथिक दवाएं दूसरे राज्यों की तुलना में 15 गुना तक महंगे दामों पर खरीदी गईं। यह मामला सामने आते ही स्वास्थ्य विभाग की खरीद प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।


जेम टेंडर की जांच में सामने आया बड़ा अंतर

प्रयागराज (उत्तर प्रदेश), उत्तराखंड और ओडिशा में होम्योपैथिक दवाओं की खरीद से जुड़े जेम टेंडर दस्तावेजों की तुलना करने पर दवाओं के दामों में कई गुना तक का फर्क सामने आया है। हैरानी की बात यह है कि दवाओं की स्ट्रेंथ और डाइल्यूशन एक समान होने के बावजूद उत्तर प्रदेश में इनकी दरें कई गुना अधिक तय की गईं।


67 दवाओं की बिड पर उठे सवाल

प्रयागराज स्थित शहीद राजा हरि प्रसाद मल राजकीय होम्योपैथी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल और जिला होम्योपैथिक चिकित्सा अधिकारी द्वारा 18 और 19 दिसंबर को जेम पोर्टल पर 67 होम्योपैथिक दवाओं की बिड जारी की गई थी। इन बिड्स में कई मदों की दरें ओडिशा और उत्तराखंड की तुलना में असामान्य रूप से अधिक पाई गईं, जिससे अनियमितताओं की आशंका और गहरा गई है।


टेंडर की शर्तें भी संदेह के घेरे में

होम्योपैथिक ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने टेंडर की शर्तों पर भी आपत्ति जताई है। आरोप है कि दोनों संस्थानों ने प्री-बिड मीटिंग को अनिवार्य कर दिया है और इसमें शामिल न होने वाली कंपनियों को बिड प्रक्रिया से बाहर रखने की शर्त रखी गई है। जानकारों का कहना है कि इस तरह की शर्तों का इस्तेमाल अक्सर पहले से तय कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया जाता है।

इतना ही नहीं, टेंडर में ब्रांड नेम से दवाओं की मांग की गई है, जबकि केंद्र और राज्य सरकार की आवश्यक ईजीएल (EGL) सूची में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है।


कीमतों का अंतर बढ़ा रहा शक

विशेषज्ञों के मुताबिक देशभर में दवाओं की कीमतों में सामान्यतः 8 से 10 प्रतिशत तक का अंतर स्वाभाविक माना जाता है। लेकिन यूपी, उत्तराखंड और ओडिशा के टेंडर दस्तावेजों में एक ही दवा के दामों में कई गुना का फर्क सामने आना न सिर्फ चौंकाने वाला है, बल्कि यह ड्रग मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी छोटी और एमएसएमई इकाइयों के साथ संभावित भेदभाव की ओर भी इशारा करता है।

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