23 जुलाई 2017 — लंदन के लॉर्ड्स स्टेडियम में भारतीय महिला क्रिकेट टीम का सपना अधूरा रह गया था। इंग्लैंड से 9 रन से हारने के बाद आंखों में आंसू थे, लेकिन उम्मीद नहीं टूटी। उस मैच में हरमनप्रीत कौर ने सेमीफाइनल में शतक और फाइनल में अर्धशतक जड़ा था।
अब 8 साल बाद, वही हरमन कप्तान हैं — और टीम इंडिया एक बार फिर वर्ल्ड कप फाइनल में है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार टीम पहले से कहीं ज्यादा तैयार, आत्मविश्वासी और आक्रामक है।
1. 2017 की हार बनी टर्निंग पॉइंट
2017 के फाइनल में भारत 229 रन का लक्ष्य चेज कर रहा था। 191/3 पर जीत तय लग रही थी, लेकिन टीम 219 पर सिमट गई और 9 रन से हार गई।
हरमनप्रीत ने कहा था — “हम जीत नहीं पाए, लेकिन अब लोग हमारा नाम जानते हैं।”
इस हार ने भारतीय महिला क्रिकेट की दिशा बदल दी। 2022 के कॉमनवेल्थ और 2023 टी-20 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में टीम फिर करीब पहुंची, पर जीत नहीं मिली।
लेकिन 30 अक्टूबर 2025 को सबकुछ बदल गया — भारत ने 7 बार की चैंपियन ऑस्ट्रेलिया को हराकर फाइनल में एंट्री ली और वनडे वर्ल्ड कप इतिहास का सबसे बड़ा चेज़ (339 रन) पूरा किया — वो भी 9 गेंदें बाकी रहते।
2. समान सैलरी से बढ़ा आत्मविश्वास
BCCI सचिव जय शाह की नीतियों ने विमेंस क्रिकेट की तस्वीर बदल दी।
अब महिला खिलाड़ियों को पुरुषों के बराबर सैलरी और मैच फीस मिलती है —
टेस्ट: ₹15 लाख
वनडे: ₹6 लाख
टी-20: ₹3 लाख
सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट की खिलाड़ियों की सालाना कमाई 75 लाख से 3 करोड़ तक पहुंच गई है।
फिटनेस, एनालिटिक्स और ट्रेनिंग में भी क्रांतिकारी सुधार हुए, जिससे खिलाड़ी अब पूरी तरह प्रोफेशनल हो चुकी हैं।
3. WPL बनी बदलाव की असली ताकत
2023 में शुरू हुई विमेंस प्रीमियर लीग (WPL) भारतीय महिला क्रिकेट के लिए मील का पत्थर साबित हुई।
इस मंच से यास्तिका भाटिया, श्रेयांका पाटिल, अमनजोत कौर, श्री चरणी और क्रांति गौड़ जैसी नई स्टार्स उभरीं।
अब भारतीय टीम 300+ स्कोर बनाने की आदत डाल चुकी है —
जहां 1978 से 2022 तक टीम ने सिर्फ 4 बार यह आंकड़ा पार किया था, वहीं पिछले 2 सालों में 12 बार 300 रन बनाए हैं।
4. कोच मजूमदार की सटीक रणनीति
कोच अमोल मजूमदार ने टीम को मानसिक रूप से मजबूत बनाया।
उन्होंने खिलाड़ियों से कहा था — “अगर 300 रन नहीं बना सकते, तो वर्ल्ड कप जीतने का सपना छोड़ दो।”
टीम ने जवाब मैदान पर दिया — ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सेमीफाइनल में 341 रन बनाकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की।
5. नई पीढ़ी ने बढ़ाई उम्मीदें
अब भारतीय टीम में छोटे शहरों की प्रतिभाएं भी चमक रही हैं।
रायगढ़ की प्रतिका रावल, हिसार की श्री चरणी, आगरा की क्रांति गौड़ और ऋचा घोष जैसी खिलाड़ियों ने फाइनल तक पहुंचाने में बड़ा रोल निभाया।
इन नई चेहरों ने टीम में जोश, ऊर्जा और निडरता का नया अध्याय लिखा है।
फाइनल में उम्मीदों का संगम
साउथ अफ्रीका के खिलाफ फाइनल में हरमन, स्मृति और दीप्ति शर्मा का अनुभव और नई जनरेशन की आक्रामकता मिलकर इतिहास रच सकती है।
पूरे देश की निगाहें अब उस एक दिन पर हैं — जब भारत की बेटियां वर्ल्ड कप की ट्रॉफी को छू सकती हैं।
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