नई दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट सोमवार को एक बेहद महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न पर सुनवाई करने जा रही है — क्या भारतीय सशस्त्र बलों में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Religious Freedom) सैन्य अनुशासन और एकता से ऊपर रखा जा सकता है?
यह मामला एक ईसाई सेना अधिकारी, लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसन, से जुड़ा है जिन्हें अपनी रेजिमेंट के मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना करने से इनकार करने पर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। अधिकारी ने यह कहते हुए मंदिर के गर्भगृह (Sanctum Sanctorum) में प्रवेश से इनकार किया था कि ऐसा करना उनके एकेश्वरवादी (Monotheistic) ईसाई विश्वास के विरुद्ध है।
मामले की पृष्ठभूमि:
लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसन 3rd कैवेलरी रेजिमेंट में तैनात थे। यह रेजिमेंट तीन स्क्वाड्रनों — सिख, जाट और राजपूत — से बनी है। रेजिमेंट में धार्मिक आयोजनों के लिए केवल मंदिर और गुरुद्वारा हैं, लेकिन सभी धर्मों के लिए कोई साझा “सर्व धर्म स्थल” नहीं है।
कमलेसन ने अदालत में बताया कि वे अपने सैनिकों के साथ सभी धार्मिक परेडों और त्योहारों — दीपावली, नवरात्रि, लोहड़ी, गुरुपुरब, होली आदि — में भाग लेते थे। उन्होंने केवल इतना अनुरोध किया था कि उन्हें मंदिर के अंदरूनी गर्भगृह में जाकर पूजा या हवन करने से छूट दी जाए, ताकि न तो उनके ईसाई विश्वास का उल्लंघन हो और न ही सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचे।
उन्होंने कहा कि वे मंदिर के आंगन में उपस्थित रहते थे, जूते और बेल्ट उतारकर, हाथ धोकर, और जब आवश्यक हो तब पगड़ी पहनकर — जैसे उनके साथी सैनिक करते थे।
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हाईकोर्ट का फैसला:
दिल्ली हाईकोर्ट ने मई 2025 में सेना के निर्णय को सही ठहराया था। अदालत ने कहा था कि कमलेसन ने अपने धर्म को अपने वरिष्ठ अधिकारी के वैध आदेश से ऊपर रखा, जो सैन्य अनुशासन का उल्लंघन है। अदालत ने टिप्पणी की कि “सेना में अनुशासन सर्वोपरि होता है, और धार्मिक स्वतंत्रता को भी उस अनुशासन के भीतर रहकर ही देखा जा सकता है।”
सरकार और सेना का पक्ष:
केंद्र सरकार ने अदालत में कहा कि रेजिमेंट में सैनिकों की भावना और मनोबल अक्सर उनकी धार्मिक आस्था से जुड़ी होती है। जब कोई अधिकारी उनसे दूरी बनाता है, तो यह उनकी एकता, उत्साह और युद्ध के समय मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
अधिकारी का तर्क:
कमलेसन का कहना है कि उन्होंने कभी भी अपने कर्तव्यों से पीछे नहीं हटे, बल्कि उनका बंधन अपने साथियों से “आपसी सम्मान, राष्ट्रप्रेम, साझा भोजन, कठिन प्रशिक्षण और मिशन के प्रति निष्ठा” पर आधारित रहा है — न कि केवल धार्मिक गतिविधियों पर।
उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें वरिष्ठ अधिकारियों ने बार-बार “धर्म और सेना सेवा में से एक को चुनने” की सलाह दी थी। अंततः मार्च 2021 में उन्हें सेवा से हटा दिया गया।
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अब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई:
अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति सूर्यकांत कर रहे हैं, के समक्ष है। अदालत यह तय करेगी कि क्या भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) को सशस्त्र बलों के अनुशासन और एकता से नीचे माना जाएगा या नहीं।
यह फैसला भविष्य में ऐसे सभी मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण साबित हो सकता है, जहाँ धार्मिक स्वतंत्रता और सैन्य अनुशासन के बीच संतुलन की रेखा खींचनी होगी।
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