भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) भूषण रामकृष्ण गवई ने कहा है कि “सिर्फ कानूनी होना किसी कानून को न्यायसंगत नहीं बना देता”। उन्होंने ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए बताया कि कई बार ऐसे कानून बने, जो कानूनी तो थे लेकिन न्याय और समानता के खिलाफ साबित हुए।
दासप्रथा, औपनिवेशिक कानून और राजद्रोह से तुलना
मुख्य न्यायाधीश गवई ने मॉरिशस में आयोजित सर मॉरिस रॉल्ट मेमोरियल लेक्चर 2025 में कहा –
दासप्रथा (Slavery) अमेरिका समेत दुनिया के कई हिस्सों में लंबे समय तक कानूनी रही, लेकिन यह मानवता और न्याय के खिलाफ थी।
क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871 जैसे औपनिवेशिक कानूनों ने भारत में पूरी जातियों और जनजातियों को जन्म से अपराधी घोषित कर दिया था।
राजद्रोह कानून (Sedition Law) का इस्तेमाल औपनिवेशिक शासकों ने स्वतंत्रता सेनानियों और विरोधियों की आवाज दबाने के लिए किया।
👉 उन्होंने कहा कि इतिहास इस बात का गवाह है कि वैधता (legality) और न्याय (justice) हमेशा समान नहीं होते।
भारतीय संविधान और आदर्शवाद
CJI ने कहा कि भारतीय संविधान ने स्पष्ट रूप से ‘कानूनी’ और ‘न्यायसंगत’ के बीच अंतर रखा है।
संविधान की न्यायपालिका से जुड़ी धाराएँ आदर्शवाद (idealism) के साथ बनाई गईं ताकि संसद और कार्यपालिका की शक्ति पर निगरानी रखी जा सके।
उन्होंने अनुच्छेद 32 को संविधान का “हृदय और आत्मा” (heart and soul) बताया, क्योंकि यह नागरिकों को सीधे सुप्रीम कोर्ट में जाकर अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा करने का अधिकार देता है।
पहलगाम हमले पर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ था करारा जवाब: मोहन भागवत
“कानून को न्याय की सेवा करनी चाहिए”
मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा –
कानून का उद्देश्य कमज़ोरों की रक्षा करना और यह सुनिश्चित करना है कि सत्ता का उपयोग जिम्मेदारी और नैतिकता के साथ हो।
Rule of Law (कानून का शासन) सुशासन और सामाजिक प्रगति का पैमाना है।
यह सिद्धांत बताता है कि सत्ता में बैठे लोग भी कानून से ऊपर नहीं हैं और उनकी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की ‘बेसिक स्ट्रक्चर’ व्याख्या
CJI ने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक बेसिक स्ट्रक्चर सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) में कहा गया था –
संसद संविधान में संशोधन कर सकती है,
लेकिन संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) को बदल नहीं सकती।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली बातचीत
उन्होंने कहा कि Rule of Law को कठोर सिद्धांत की तरह नहीं देखना चाहिए, बल्कि यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली बातचीत है –
“जजों और नागरिकों के बीच, संसद और जनता के बीच, राष्ट्रों और उनके इतिहास के बीच संवाद।”
यह इस बात से जुड़ा है कि हम अपनी आज़ादी और अधिकारों को गरिमा के साथ कैसे संचालित करते हैं और लोकतंत्र में स्वतंत्रता और सत्ता के बीच टकराव को किस तरह हल करते हैं।
मॉरिशस में दिया व्याख्यान
यह व्याख्यान मॉरिशस के राष्ट्रपति धरमबीर गोकहूल, प्रधानमंत्री नविनचंद्र रामगुलाम और वहाँ की मुख्य न्यायाधीश रहाना मंगली गुलबुल की मौजूदगी में दिया गया।
✅ साफ है कि CJI गवई ने यह संदेश दिया कि किसी कानून की वैधता (legality) ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसकी न्यायप्रियता (justice) और नैतिकता (ethics) भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
➤ You May Also Like




































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































1 thought on “सिर्फ कानूनी होना किसी कानून को न्यायसंगत नहीं बनाता” – मुख्य न्यायाधीश गवई”