जागृत भारत,वॉशिंगटन : अमेरिका की एक संघीय अपील अदालत ने H-1B वीजा पर लगाए गए 100,000 अमेरिकी डॉलर के शुल्क को लेकर ट्रंप प्रशासन को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने निचली अदालत के उस आदेश पर रोक लगाने से मना कर दिया, जिसमें इस शुल्क को लागू करने से रोका गया था।
बोस्टन स्थित फर्स्ट सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि ट्रंप प्रशासन यह पर्याप्त रूप से नहीं दिखा सका कि शुल्क लगाने का उसका अधिकार कानून के अनुरूप था। इससे पहले निचली अदालत ने अपने 8 जून के फैसले में इस शुल्क को कांग्रेस की मंजूरी के बिना लगाया गया गैर-कानूनी कर (टैक्स) बताया था।
ट्रंप प्रशासन ने बढ़ाई थी फीस
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सितंबर 2025 में एक आदेश के जरिए H-1B वीजा आवेदन शुल्क को बढ़ाकर 100,000 अमेरिकी डॉलर कर दिया था। इससे पहले यह शुल्क लगभग 2,000 से 5,000 अमेरिकी डॉलर के बीच था।
भारतीय पेशेवरों पर पड़ सकता है प्रभाव
H-1B वीजा अमेरिकी कंपनियों, विशेषकर प्रौद्योगिकी क्षेत्र, के लिए विदेशी पेशेवरों की भर्ती का प्रमुख माध्यम है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, H-1B वीजा प्राप्त करने वालों में बड़ी संख्या भारतीय नागरिकों की होती है, इसलिए शुल्क वृद्धि का सबसे अधिक असर भारतीय पेशेवरों और अमेरिकी टेक कंपनियों पर पड़ने की आशंका जताई गई थी।
H-1B कार्यक्रम
H-1B कार्यक्रम के तहत अमेरिका हर वर्ष 65,000 नियमित वीजा जारी करता है। इसके अतिरिक्त अमेरिकी विश्वविद्यालयों से उच्च डिग्री प्राप्त आवेदकों के लिए 20,000 अतिरिक्त वीजा उपलब्ध होते हैं। यह वीजा सामान्यतः 3 से 6 वर्ष तक के लिए वैध होता है।
शुल्क बढ़ाने का तर्क
ट्रंप प्रशासन का कहना था कि H-1B कार्यक्रम का दुरुपयोग किया जा रहा है और कुछ कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों के स्थान पर कम वेतन वाले विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए इसका इस्तेमाल कर रही हैं। वहीं, अदालत में इस शुल्क की वैधता को चुनौती दी गई, जिसके बाद निचली अदालत ने इसे लागू करने पर रोक लगा दी थी।
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