जागृत भारत | नई दिल्ली(New Delhi): महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGA) के डेटाबेस से 10 अक्टूबर से 14 नवंबर 2025 के बीच लगभग 27 लाख मजदूरों के नाम हटाए गए, जबकि इसी अवधि में केवल 10.5 लाख नए मजदूर जोड़े गए। नाम हटने की यह संख्या पिछले कई महीनों की तुलना में काफी अधिक है और इसी कारण इसे लेकर चर्चा तेज हो गई है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं और शोधकर्ताओं के समूह Lib Tech ने इसे “असामान्य रूप से ज्यादा” बताया है। उनका कहना है कि पिछले छह महीनों में कुल 15 लाख नाम हटे, लेकिन सिर्फ एक महीने में यह संख्या 27 लाख पहुँच जाना बड़ी विसंगति है।
नाम हटने में राज्यों की भूमिका
जिन राज्यों में ई-केवाईसी की पूर्णता दर अधिक है, वहाँ मजदूरों के नाम हटने की संख्या भी ज्यादा रही।
आंध्र प्रदेश – 78.4% ई-केवाईसी पूरा, 15.92 लाख मजदूरों के नाम हटे
तमिलनाडु – 67.6%, 30,529 नाम हटे
छत्तीसगढ़ – 66.6%, 1.04 लाख नाम हटे
इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि डिजिटल सत्यापन के साथ मजदूरों की पहचान और पात्रता की जांच तेज हो गई है।
केंद्र का पक्ष
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि नाम हटाने का सीधा संबंध ई-केवाईसी से नहीं है। मंत्रालय के अनुसार, MGNREGA के जॉब-कार्ड की जांच एक निरंतर प्रक्रिया है और इसका दायित्व मुख्य रूप से राज्य सरकारों और ग्राम पंचायतों का है। इसके अलावा, हर पाँच साल में जॉब-कार्ड का नवीनीकरण भी आवश्यक है, जो इस समय चल रहा है। मंत्रालय ने नाम हटाने के लिए एक SOP (मानक संचालन प्रक्रिया) भी जारी की है, जिसमें—
हटाए जाने वाले जॉब-कार्ड की सूची सार्वजनिक करना
मजदूरों को आपत्ति दर्ज करने का समय देना
अंतिम निर्णय ग्रामसभा द्वारा लेना
जैसी प्रक्रियाएँ शामिल हैं।
डिजिटल निगरानी और तकनीकी चुनौतियाँ
ई-केवाईसी प्रक्रिया में मजदूरों की पहचान को आधार, बैंक विवरण और फोटो-अपलोड के माध्यम से मिलान किया जाता है। इस दौरान कई तकनीकी समस्याएँ सामने आईं, जैसे—
कार्यस्थल की सही तस्वीरें अपलोड न होना
सुबह-शाम दोनों समय फोटो उपलब्ध न होना
आधार, बैंक और जॉब-कार्ड विवरण में मेल न होना
एक ही फोटो का कई जगह इस्तेमाल
NMMS (National Mobile Monitoring System) ऐप में भी “फर्जी” या “असंबंधित” तस्वीरों के अपलोड होने की शिकायतें मिलीं, जिसके बाद केंद्र ने राज्यों को सख़्त सत्यापन का निर्देश दिया।
विशेषज्ञों की चिंता
शोधकर्ताओं का कहना है कि हर बार जब कोई नई आधार आधारित तकनीक लागू होती है—चाहे वह ABPS हो या ई-केवाईसी—तब मजदूरों के नाम हटने की संख्या बढ़ जाती है। विशेषज्ञों का तर्क है कि डिजिटल प्रणालियाँ सत्यापन को मजबूत बनाती हैं, लेकिन साथ ही कई वास्तविक मजदूर भी योजना से बाहर हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें इन तकनीकी प्रक्रियाओं को पूरा करना मुश्किल लगता है।
आगे की स्थिति
मंत्रालय ने निर्देश दिया है कि नाम हटाए गए मजदूरों को आपत्ति दर्ज करने और पुनः सत्यापन का पूरा मौका मिले। ग्रामसभा का अंतिम निर्णय ही मान्य माना जाएगा। MGNREGA में इतनी बड़ी संख्या में नाम हटने के बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि डिजिटलीकरण लाभार्थियों की पहचान को मजबूत कर रहा है या वास्तविक मजदूरों के लिए नई चुनौतियाँ खड़ी कर रहा है।
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