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भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर में नई उड़ान, स्काईरूट एयरोस्पेस की सफलता से खुलेंगे अरबों डॉलर के अवसर

Published on: July 26, 2026
India's private space sector

जागृत भारत,नई दिल्ली : भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। हैदराबाद स्थित स्पेस-टेक कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने सफल रॉकेट लॉन्च कर देश की निजी अंतरिक्ष कंपनियों के लिए नई संभावनाओं के दरवाजे खोल दिए हैं। इस उपलब्धि के साथ भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जहां निजी कंपनियां रॉकेट लॉन्च करने की क्षमता रखती हैं। हालांकि भारतीय प्राइवेट स्पेस सेक्टर अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन बढ़ती वैश्विक सैटेलाइट लॉन्च मांग के बीच इसके लिए बड़ा बाजार तैयार हो रहा है।

भारत ने वर्ष 2020 में निजी कंपनियों के लिए स्पेस सेक्टर खोला था। सरकार का लक्ष्य वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में भारत की हिस्सेदारी को मौजूदा करीब 2 प्रतिशत से बढ़ाकर वर्ष 2030 तक 10 प्रतिशत करना है। इसके तहत निजी कंपनियों को रॉकेट और सैटेलाइट विकसित करने के साथ-साथ इसरो की लॉन्च सुविधाओं का इस्तेमाल करने का अवसर भी दिया गया। सरकार के मुताबिक, भारत में अब 400 से ज्यादा स्पेस स्टार्टअप काम कर रहे हैं। इनमें स्काईरूट एयरोस्पेस सबसे प्रमुख कंपनियों में से एक है और इस सेक्टर की इकलौती यूनिकॉर्न कंपनी बताई जाती है।

तेजी से बढ़ रहा सैटेलाइट लॉन्च का बाजार

दुनियाभर में सैटेलाइट की बढ़ती जरूरत के साथ लॉन्च सर्विस का बाजार भी तेजी से विस्तार कर रहा है। ग्लोबल सैटेलाइट लॉन्च सर्विस मार्केट का मौजूदा आकार करीब 12.1 अरब से 25.3 अरब अमेरिकी डॉलर के बीच आंका जाता है। अनुमान है कि 14 से 15.6 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर के साथ यह बाजार वर्ष 2030 तक 41 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का हो सकता है।

इस बाजार में फिलहाल नॉर्थ अमेरिका का दबदबा है और वैश्विक राजस्व में उसकी हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से ज्यादा है। अमेरिका का कमर्शियल स्पेस सेक्टर लॉन्च वॉल्यूम और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट दोनों मामलों में आगे है।

स्काईरूट की सफलता क्यों है अहम?

स्काईरूट एयरोस्पेस की योजना अगले साल से कमर्शियल ऑपरेशन शुरू करने की है। कंपनी हर महीने एक रॉकेट लॉन्च करने की दिशा में काम कर रही है। भारत की स्पेस टेक्नोलॉजी की सबसे बड़ी ताकत लंबे समय से कम लागत रही है। इसरो ने पश्चिमी देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कम खर्च में मंगलयान और चंद्रयान जैसे मिशन पूरे किए हैं।

स्काईरूट के सह-संस्थापकों के अनुसार, कंपनी ने सीमित संसाधनों के बीच बेहद सावधानी से काम किया है। जहां स्पेसएक्स तेजी से प्रयोग करने और असफलताओं से सीखकर आगे बढ़ने की रणनीति अपनाती है, वहीं स्काईरूट के लिए शुरुआती दौर में पहली कोशिश में सफलता हासिल करना बेहद महत्वपूर्ण था।

रिलायंस जियो के सैटेलाइट प्लान से बढ़ेगी मांग

भारत में सैटेलाइट लॉन्च की संभावनाओं का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि स्पेस रेगुलेटर IN-SPACe ने रिलायंस जियो के करीब 1,600 लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट तैनात करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। इससे आने वाले वर्षों में भारत में सैटेलाइट निर्माण और लॉन्च सेवाओं की मांग बढ़ने की उम्मीद है।

स्काईरूट की सफलता ने देश के बड़े उद्योगपतियों का ध्यान भी इस क्षेत्र की ओर आकर्षित किया है। हाल में वेदांता के चेयरमैन और उद्योगपति अनिल अग्रवाल की कंपनी के सह-संस्थापक पवन चंदना से मुलाकात भी चर्चा में रही।

किन कंपनियों से है स्काईरूट की टक्कर?

स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना वर्ष 2018 में पवन चंदना और नाग भरत डाका ने की थी। कंपनी का लक्ष्य छोटे सैटेलाइट को कम लागत में अंतरिक्ष तक पहुंचाना है। पवन चंदना का मानना है कि भविष्य में सैटेलाइट लॉन्च की प्रति किलोग्राम लागत को काफी नीचे लाया जा सकता है।

वैश्विक स्तर पर स्काईरूट को कई बड़ी कंपनियों से मुकाबला करना होगा। अमेरिका की स्पेसएक्स, रॉकेट लैब, बोइंग और लॉकहीड मार्टिन, फ्रांस का एरियन ग्रुप और जर्मनी की Isar Aerospace जैसी कंपनियां इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। वहीं चीन और जापान जैसे देशों में स्पेस सेक्टर में सरकारी संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

पूंजी और टैलेंट सबसे बड़ी चुनौती

भारत के निजी स्पेस सेक्टर के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में पूंजी जुटाना और विशेषज्ञ प्रतिभाओं की उपलब्धता शामिल हैं। स्काईरूट ने अब तक करीब 160 मिलियन अमेरिकी डॉलर जुटाए हैं और एक सब-ऑर्बिटल टेस्ट फ्लाइट के साथ ऑर्बिटल कमर्शियल मिशन पूरा किया है।

इसके मुकाबले जर्मनी की Isar Aerospace ने अभी तक सफल ऑर्बिटल लॉन्च नहीं किया है, लेकिन वह अपने पिछले चार फंडिंग राउंड में 580 मिलियन अमेरिकी डॉलर से ज्यादा जुटा चुकी है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अंतरराष्ट्रीय स्पेस इंडस्ट्री में कंपनियों को किस स्तर की पूंजी की जरूरत होती है।

इसके अलावा भारत में अनुभवी स्पेस इंजीनियरों और विशेषज्ञों की संख्या भी सीमित है। जैसे-जैसे निजी कंपनियों की संख्या बढ़ेगी, कुशल मानव संसाधन की मांग भी बढ़ने की संभावना है।

भारत के लिए कितना बड़ा है मौका?

भारत की स्पेस इकॉनमी वर्ष 2022 में करीब 8.4 अरब अमेरिकी डॉलर की थी। अनुमान है कि वर्ष 2033 तक यह बढ़कर 44 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकती है। ऐसे में निजी कंपनियों के लिए लॉन्च सर्विस, सैटेलाइट निर्माण और स्पेस-आधारित सेवाओं में बड़े अवसर पैदा हो सकते हैं।

हालांकि छोटे सैटेलाइट लॉन्च के बाजार में पहले से कई अनुभवी कंपनियां मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, रॉकेट लैब के इलेक्ट्रॉन रॉकेट की लॉन्च लागत करीब 25,000 डॉलर प्रति किलोग्राम बताई जाती है। वहीं फायरफ्लाई एयरोस्पेस के अल्फा रॉकेट की लागत लगभग 14,560 डॉलर प्रति किलोग्राम है।

इसरो के स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल यानी SSLV की लागत करीब 7,050 से 8,270 डॉलर प्रति किलोग्राम के बीच आंकी जाती है। वहीं स्पेसएक्स के फाल्कन-9 ने डेडिकेटेड लॉन्च की लागत को करीब 3,000 डॉलर प्रति किलोग्राम तक लाने में सफलता हासिल की है।

स्काईरूट ने अभी अपने विक्रम-1 रॉकेट की आधिकारिक लॉन्च कीमत सार्वजनिक नहीं की है। हालांकि, माना जा रहा है कि इसकी लागत रॉकेट लैब के इलेक्ट्रॉन और फायरफ्लाई एयरोस्पेस के अल्फा जैसे विकल्पों के मुकाबले प्रतिस्पर्धी हो सकती है।

निष्कर्ष

स्काईरूट एयरोस्पेस की सफलता भारत के निजी स्पेस सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ मानी जा रही है। बढ़ती सैटेलाइट मांग, कम लागत वाली तकनीक और सरकार की निजी कंपनियों को बढ़ावा देने वाली नीतियां भारत को वैश्विक स्पेस मार्केट में मजबूत स्थिति दिला सकती हैं। हालांकि पूंजी, तकनीकी विशेषज्ञता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियां अभी बनी हुई हैं। अगर भारतीय कंपनियां इन चुनौतियों से पार पाने में सफल होती हैं, तो आने वाले वर्षों में भारत की स्पेस इकॉनमी के साथ-साथ निजी रॉकेट लॉन्च बाजार भी तेजी से विस्तार कर सकता है।


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