जागृत भारत,इस्लामाबाद/नई दिल्ली : सिंधु जल संधि पर भारत द्वारा रोक लगाए जाने के बाद दोनों देशों के बीच जल संसाधनों को लेकर बहस तेज हो गई है। पाकिस्तान ने भारत पर पानी को “हथियार” की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है, लेकिन सिंधु जल मामलों के पूर्व भारतीय आयुक्त पी.के. सक्सेना ने इन आरोपों को तथ्यों के आधार पर खारिज करते हुए कहा है कि संधि का मौजूदा स्वरूप भारत के लिए असंतुलित और अन्यायपूर्ण है।
पाकिस्तान के आरोपों पर भारतीय पक्ष का जवाब
पूर्व भारतीय आयुक्त पी.के. सक्सेना ने 9 मई को प्रकाशित एक लेख में कहा था कि सिंधु जल संधि को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने का काम स्वयं पाकिस्तान करता रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि भारत पर लगाए जाने वाले आरोप वास्तविक तथ्यों से मेल नहीं खाते।
सक्सेना के इन बयानों के बाद पाकिस्तान की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई। पाकिस्तान के वर्तमान सिंधु जल आयुक्त सैयद मुहम्मद अली शाह ने एक लेख में भारतीय दावों का खंडन करते हुए कहा कि यह संधि भारत की उदारता का परिणाम नहीं थी, बल्कि विभाजन के बाद उत्पन्न जल सुरक्षा संबंधी चिंताओं और 1948 के नहर-जल संकट की पृष्ठभूमि में अस्तित्व में आई थी।
कृषि और जल सुरक्षा पर पाकिस्तान की निर्भरता
पाकिस्तानी अधिकारी ने कहा कि देश का कृषि क्षेत्र सिंधु नदी प्रणाली से मिलने वाले निरंतर जल प्रवाह पर अत्यधिक निर्भर है। उनके अनुसार, संधि का उद्देश्य ऊपरी धारा वाले देश द्वारा मनमाने कदमों को रोकना और निचली धारा वाले देश के हितों की रक्षा करना था।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि संधि भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित दायरे में जलविद्युत परियोजनाएं विकसित करने की अनुमति देती है।
भारत को परियोजनाएं बनाने का अधिकार
पी.के. सक्सेना ने अपने लेख में बताया कि सिंधु नदी प्रणाली के जल संसाधनों का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान के नियंत्रण में है, जबकि भारत के हिस्से में करीब 20 प्रतिशत जल आता है। उन्होंने कहा कि भारत को पूर्वी नदियों का अधिकार मिला, जबकि पश्चिमी नदियां पाकिस्तान को आवंटित की गईं, लेकिन इसके बावजूद भारत को पश्चिमी नदियों के जल का सीमित उपयोग और “रन ऑफ द रिवर” आधारित जलविद्युत परियोजनाएं विकसित करने का अधिकार प्राप्त है।
क्या भारत के साथ अन्याय करती है संधि?
सक्सेना का कहना है कि सिंधु जल संधि भारत पर कई एकतरफा प्रतिबंध लगाती है। दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तानी जल आयुक्त ने भी इन प्रतिबंधों के अस्तित्व को स्वीकार किया, हालांकि उन्होंने इन्हें दंडात्मक नहीं बल्कि निचली धारा वाले देश के अधिकारों की सुरक्षा के लिए आवश्यक प्रावधान बताया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान यह दावा नहीं करता कि भारत पश्चिमी नदियों पर कोई परियोजना नहीं बना सकता। हालांकि, उनका कहना था कि किसी भी परियोजना को केवल “रन ऑफ द रिवर” परियोजना घोषित कर देने से वह स्वतः संधि के अनुरूप नहीं हो जाती।
परियोजनाओं पर आपत्ति का अधिकार बरकरार
सैयद मुहम्मद अली शाह ने कहा कि पाकिस्तान को संधि के तहत भारतीय परियोजनाओं पर तकनीकी और कानूनी आधार पर आपत्ति दर्ज कराने का अधिकार प्राप्त है। उनके अनुसार, कोई परियोजना आर्थिक या तकनीकी रूप से लाभकारी हो सकती है, लेकिन यदि वह संधि के प्रावधानों का पालन नहीं करती, तो उस पर सवाल उठाए जा सकते हैं।
भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लेकर बढ़ता विवाद आने वाले समय में दोनों देशों के संबंधों और क्षेत्रीय जल प्रबंधन नीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।
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