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RSS रजिस्ट्रेशन विवाद पर कानूनी बहस तेज, महेश जेठमलानी ने प्रियांक खरगे के सवालों को बताया ‘राजनीतिक’

Published on: June 18, 2026
Legal aspects of the RSS registration controversy

जागृत भारत,नागपुर : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के रजिस्ट्रेशन, फंडिंग और पारदर्शिता को लेकर उठे सवालों पर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खरगे के रुख की आलोचना करते हुए इसे “राजनीतिक उकसावे” और “वंशवादी सोच” से प्रेरित बताया है।

खुला पत्र और बढ़ा विवाद

कर्नाटक के मंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के पुत्र प्रियांक खरगे ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को एक खुला पत्र लिखकर संगठन के रजिस्ट्रेशन, फंडिंग और वित्तीय पारदर्शिता से जुड़े सवाल उठाए थे।

इस पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत पहले ही प्रतिक्रिया देते हुए इसे राजनीतिक बयानबाजी करार दे चुके हैं और कहा था कि हिंदू पहचान किसी औपचारिक रजिस्ट्रेशन पर निर्भर नहीं है।

महेश जेठमलानी की प्रतिक्रिया

वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने प्रियांक खरगे के पत्र को “सोची-समझी राजनीतिक चुनौती” बताते हुए कहा कि किसी मंत्री को अपने पद के आधार पर कानून या संवैधानिक ढांचे से परे जाकर किसी संगठन पर नियम थोपने का अधिकार नहीं है।

उन्होंने कहा कि भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(c) के तहत नागरिकों को संगठन बनाने की स्वतंत्रता देता है, जबकि अनुच्छेद 19(4) इस अधिकार पर केवल सीमित और विधिसम्मत प्रतिबंधों की अनुमति देता है।

जेठमलानी के अनुसार, किसी भी स्वैच्छिक संगठन के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य नहीं है, और ऐसे संगठनों के अस्तित्व को किसी राजनीतिक पदाधिकारी की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती।

‘मंत्री पद कानून से ऊपर नहीं’

उन्होंने कहा कि मंत्री का पद केवल कार्यकारी शक्तियां देता है, लेकिन यह किसी व्यक्ति को संविधान से परे जाकर आदेश जारी करने का अधिकार नहीं देता। जेठमलानी ने आरोप लगाया कि इस तरह के सवाल कानून से अधिक राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित लगते हैं और इनका संवैधानिक आधार कमजोर है।

फंडिंग और कानूनी स्थिति पर टिप्पणी

आरएसएस की फंडिंग और ‘गुरुदक्षिणा’ को लेकर पूछे गए सवालों पर उन्होंने कहा कि न्यायालय पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि यह स्वैच्छिक योगदान है। उन्होंने एक पुराने न्यायिक निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि इसे टैक्स या अनिवार्य वित्तीय व्यवस्था के रूप में नहीं देखा जा सकता।

राजनीतिक बहस तेज

इस पूरे मामले ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है, जहां एक ओर कांग्रेस पारदर्शिता के सवाल उठा रही है, वहीं दूसरी ओर समर्थक पक्ष इसे संवैधानिक अधिकारों और स्वैच्छिक संगठनों के दायरे से जोड़कर देख रहा है। फिलहाल इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच बयानबाजी जारी है और विवाद के और बढ़ने की संभावना बनी हुई है।


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