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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: ‘डिजिटल रेप’ की शिकायत पर FIR न दर्ज करने वाले पुलिस अधिकारियों की होगी जांच

Published on: August 14, 2026
Chief of Allahabad High Court

जागृत भारत,प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर समेत कई पुलिस अधिकारियों के खिलाफ जांच के आदेश दिए हैं। अधिकारियों पर आरोप है कि शिकायत मिलने के बावजूद उन्होंने कथित ‘डिजिटल रेप’, छेड़छाड़ और अन्य संज्ञेय अपराधों के मामले में प्राथमिकी दर्ज नहीं की। कोर्ट ने इस मामले में आरोपी अर्पित गुप्ता की याचिका खारिज करते हुए पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए।

जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस तरुण सक्सेना की पीठ ने कहा कि शिकायत मिलने के बाद FIR दर्ज नहीं होने के कारण पीड़िता को मजिस्ट्रेट की अदालत का रुख करना पड़ा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यौन अपराध की शिकायत मिलने पर प्रारंभिक स्तर पर पुलिस का काम पीड़िता से सबूत जुटाने की जिम्मेदारी लेना नहीं, बल्कि कानून के मुताबिक कार्रवाई करना है।

सबूत जुटाना पीड़िता की जिम्मेदारी नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस किसी यौन उत्पीड़न की शिकायत पर केवल इस आधार पर FIR दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकती कि शिकायतकर्ता के पास व्हाट्सऐप चैट, कॉल रिकॉर्डिंग या अन्य ठोस सबूत नहीं हैं। अदालत ने कहा कि जब किसी व्यक्ति की ओर से संज्ञेय अपराध की जानकारी पुलिस को दी जाती है, तो उस स्तर पर कानूनी जांच और साक्ष्य जुटाने की जिम्मेदारी पुलिस की होती है। पीड़िता पर यह जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती कि वह पहले ही अपराध के पर्याप्त सबूत उपलब्ध कराए।

रियल एस्टेट कारोबारी पर कर्मचारी ने लगाए आरोप

मामले में आरोपी अर्पित गुप्ता को रियल एस्टेट कंपनी का मालिक बताया गया है। गुप्ता ने मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद अपने खिलाफ दर्ज रेप केस को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था। शिकायतकर्ता महिला आरोपी की कर्मचारी बताई गई है। गाजियाबाद की अदालत में दाखिल शिकायत में महिला ने आरोप लगाया था कि अर्पित गुप्ता उसके साथ अपने केबिन में छेड़छाड़ करता था और घटना के बारे में किसी को जानकारी देने पर धमकी देता था।

हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों और पुलिस की ओर से की गई कार्रवाई का संज्ञान लेते हुए अधिकारियों की भूमिका की जांच के निर्देश दिए।

क्या है ‘डिजिटल रेप’?

अदालत के आदेश में इस्तेमाल किए गए ‘डिजिटल रेप’ शब्द को लेकर अक्सर भ्रम होता है। इसका इंटरनेट या किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर होने वाले साइबर अपराध से संबंध नहीं है। यहां ‘डिजिटल’ शब्द लैटिन भाषा के ‘Digitus’ से आया है, जिसका अर्थ उंगली या अंगूठा होता है। कानूनी संदर्भ में इसका इस्तेमाल बिना सहमति किसी महिला या बच्चे के निजी अंग में उंगली, अंगूठे या किसी वस्तु के प्रवेश से संबंधित गंभीर यौन अपराध के लिए किया जाता है।

गंभीर यौन अपराध की श्रेणी में

ऐसे कृत्य को परिस्थितियों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर बलात्कार अथवा गंभीर यौन अपराध के रूप में देखा जा सकता है। नाबालिग पीड़ितों के मामलों में POCSO कानून के तहत भी सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। अदालतों ने पिछले कुछ वर्षों में अपने आदेशों में ‘डिजिटल रेप’ शब्द का इस्तेमाल किया है। ऐसे मामलों में अपराध की प्रकृति, पीड़ित की उम्र और लागू धाराओं के आधार पर सजा तय होती है।

हाईकोर्ट की टिप्पणी का महत्व

इस मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यौन अपराध की शिकायत मिलने के बाद FIR दर्ज करने से पहले पुलिस शिकायतकर्ता से मुकदमे योग्य सबूत मांगकर अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती। अदालत के आदेश से पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर भी महत्वपूर्ण संदेश गया है। मामले में आगे की जांच और कानूनी कार्रवाई तथ्यों के आधार पर निर्धारित होगी।


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