पाकिस्तानी नीति विश्लेषक और शोधकर्ता सोहा निसार ने द न्यूज में लिखे अपने लेख ‘आजादी पर मंडराता सूखा’ में सिंधु जल संधि से जुड़े संभावित प्रभावों का जिक्र किया है। उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान की कृषि और ऊर्जा व्यवस्था सिंधु नदी प्रणाली पर काफी हद तक निर्भर है। ऐसे में लंबे समय तक जल प्रवाह प्रभावित होने की स्थिति में देश के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
80 फीसदी खेती सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर होने का दावा
सोहा निसार के मुताबिक पाकिस्तान की करीब 80 फीसदी खेती योग्य जमीन सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। इसके अलावा देश की बिजली व्यवस्था में भी सिंधु नदी प्रणाली से बनने वाली पनबिजली की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में पानी के प्रवाह को लेकर किसी भी तरह की अनिश्चितता पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा पर असर डाल सकती है।
उन्होंने कहा कि सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे विवाद और विश्व बैंक की मध्यस्थता के बाद अस्तित्व में आई थी। विभाजन के बाद दोनों देशों के बीच नदियों के पानी को लेकर वर्षों तक बातचीत चली, जिसके बाद वर्ष 1960 में यह समझौता हुआ।
तीन युद्धों के दौरान भी कायम रही संधि
पाकिस्तानी विशेषज्ञ ने अपने लेख में कहा कि सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच कई दशकों तक चली दुश्मनी के बावजूद कायम रही। दोनों देशों के बीच युद्धों के दौरान भी यह समझौता बना रहा। हालांकि, पिछले साल भारत ने इसे निलंबित करने का ऐलान किया, जिसके बाद पाकिस्तान में इसके भविष्य को लेकर चिंता बढ़ गई है।
संधि के तहत पाकिस्तान को सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों के पानी से संबंधित अधिकार मिले थे। पाकिस्तान का आरोप है कि भारत द्वारा संधि को निलंबित करने और नदियों के प्रवाह को प्रभावित करने की कोशिशों से उसके लिए गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है। भारत अपनी ओर से पाकिस्तान के आतंकवाद के समर्थन और सुरक्षा चिंताओं को संधि से जुड़े कदमों के संदर्भ में रखता रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर मामला उठाने की कोशिश
पाकिस्तान इस विवाद को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उठाता रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, मध्यस्थता और संधि से जुड़े विवादों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानूनी प्रक्रिया भी चली है। हालांकि, भारत ने संबंधित प्रक्रिया और उसके अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति जताई है।
सोहा निसार ने कहा कि पाकिस्तान को केवल भारत पर आरोप लगाने के बजाय अपने घरेलू जल प्रबंधन पर भी गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। उनके मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान का पक्ष तभी मजबूत होगा, जब वह देश के भीतर पानी के इस्तेमाल और संरक्षण की व्यवस्था को बेहतर बनाए।
पाकिस्तान को जल भंडारण बढ़ाने की सलाह
विशेषज्ञ ने पाकिस्तान को लंबे समय के लिए जल भंडारण की क्षमता बढ़ाने और पानी के बेहतर प्रबंधन की सलाह दी है। इसके अलावा नदियों के प्रवाह में होने वाले बदलावों का व्यवस्थित रिकॉर्ड रखने और उपलब्ध आंकड़ों को सुरक्षित रखने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है।
उनका सुझाव है कि पाकिस्तान को विश्व बैंक सहित संबंधित अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ बातचीत जारी रखनी चाहिए। साथ ही देश के भीतर जल संरक्षण, भंडारण और सिंचाई व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए।
भारत-पाकिस्तान के बीच पानी बना बड़ा मुद्दा
सिंधु जल संधि लंबे समय से दोनों देशों के बीच सहयोग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण रही है। लेकिन मौजूदा तनाव के बाद पानी अब भारत-पाकिस्तान संबंधों का एक बेहद संवेदनशील मुद्दा बन गया है। पाकिस्तान के लिए चुनौती यह है कि वह एक ओर भारत के साथ इस विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाए और दूसरी ओर अपनी जल व्यवस्था की कमजोरियों को भी दूर करे।
फिलहाल पाकिस्तान में इस बात को लेकर बहस तेज है कि यदि लंबे समय तक जल प्रवाह में अनिश्चितता बनी रहती है तो कृषि, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा पर इसका क्या असर पड़ेगा।