जागृत भारत,प्रयागराज : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धर्म की पसंद के अधिकार को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने दो बालिग बहनों को उनके माता-पिता के घर में कथित तौर पर उनकी इच्छा के विरुद्ध रखने को गैरकानूनी हिरासत माना है। अदालत ने दोनों बहनों को कुल 25 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह राशि दोनों बहनों में बराबर बांटी जाएगी। कोर्ट ने आदेश का पालन आठ सप्ताह के भीतर सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
अपनी मर्जी से धर्म बदलने का दावा
मामले की सुनवाई के दौरान दोनों बहनों ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया था। बड़ी बहन अंशु ने बताया कि उसने 2020 में धर्म बदला, जबकि दिया ने 2021 में धर्म परिवर्तन किया था। दोनों ने कहा कि उनका फैसला उनके व्यक्तिगत विश्वास, अंतरात्मा, मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतोष पर आधारित था।
दोनों बहनों ने जबरन धर्म परिवर्तन, धोखे, दबाव, अनुचित प्रभाव या लालच के आरोपों से इनकार किया। उनका कहना था कि धर्म बदलने के बाद उनके पिता ने उन्हें उनकी इच्छा के खिलाफ घर में रहने के लिए मजबूर किया।
कोर्ट ने दोनों बहनों से की बातचीत
हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाने से पहले दोनों महिलाओं से सीधे बातचीत की। अदालत के अनुसार, दोनों के जवाब स्पष्ट, स्वाभाविक और स्वतंत्र थे। सुनवाई के दौरान ऐसा कोई संकेत नहीं मिला कि वे डर, दबाव, लालच या किसी अन्य अनुचित प्रभाव में थीं।
कोर्ट ने कहा कि बालिग व्यक्ति को अपनी आस्था, धर्म, रहने की जगह और निजी जीवन से जुड़े फैसले लेने का संवैधानिक अधिकार है।
अनुच्छेद 21 और 25 का दिया हवाला
हाई कोर्ट ने कहा कि अपनी निजी पसंद के अनुसार जीवन जीने का अधिकार व्यक्ति की गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है, जबकि अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सामान्य परिस्थितियों में परिवार या राज्य किसी बालिग व्यक्ति के ऐसे निजी फैसलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते, जब तक उस पर कानूनन या संवैधानिक रूप से वैध प्रतिबंध लागू न हो।
सरकार ने एफआईआर का दिया हवाला
उत्तर प्रदेश सरकार ने महिलाओं के पिता की ओर से दर्ज एफआईआर का हवाला देते हुए हेबियस कॉर्पस याचिका का विरोध किया था। एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि दोनों बहनों का धर्म जबरन और धोखे से बदला गया।
जांच के दौरान उत्तर प्रदेश प्रोहिबिशन ऑफ अनलॉफुल कन्वर्जन ऑफ रिलिजन एक्ट, 2021 की संबंधित धाराओं समेत भारतीय न्याय संहिता की अन्य धाराएं भी जोड़ी गईं। राज्य सरकार ने दलील दी कि कथित धर्म परिवर्तन एक बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकता है और महिलाओं की रिहाई से जांच प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, हाई कोर्ट ने कहा कि संबंधित आपराधिक मामले की जांच कानून के मुताबिक जारी रह सकती है और हेबियस कॉर्पस मामले में की गई टिप्पणियों का उस जांच पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
महिलाओं की हिरासत को बताया पूरी तरह गैरकानूनी
हाई कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि दोनों महिलाओं को उनकी इच्छा के विरुद्ध घर में रखा गया और उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर रोक लगाई गई। कोर्ट ने कहा कि बालिग होने के बाद व्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वायत्तता पर माता-पिता का अधिकार हावी नहीं हो सकता।
अदालत ने कहा कि किसी बालिग व्यक्ति की आवाजाही या स्वतंत्रता पर बिना वैध कानूनी आधार के रोक लगाना गैरकानूनी हिरासत और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
राज्य की भूमिका पर भी कोर्ट ने उठाए सवाल
6 अगस्त को जारी 22 पन्नों के आदेश में हाई कोर्ट ने महिलाओं की स्वतंत्रता की रक्षा करने में राज्य मशीनरी की भूमिका पर भी गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि राज्य ने उनकी रिहाई सुनिश्चित करने के बजाय आपराधिक कार्रवाई की आड़ में कथित हिरासत को जारी रहने दिया।
अदालत ने इसे संवैधानिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताते हुए मिसाल कायम करने वाले संवैधानिक मुआवजे का आधार माना।
अपनी पसंद से रहने के लिए स्वतंत्र
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोनों महिलाएं अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी स्थान और किसी भी व्यक्ति के साथ रहने के लिए स्वतंत्र हैं। उनके पिता, राज्य या कोई अन्य व्यक्ति उनकी इस व्यक्तिगत पसंद में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। कोर्ट के आदेश के अनुसार, दोनों बहनों को कुल 25 लाख रुपये मुआवजा दिया जाएगा, जिसमें पिता और उत्तर प्रदेश सरकार की संयुक्त जिम्मेदारी तय की गई है।
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