जागृत भारत,नई दिल्ली/बीजिंग/इस्लामाबाद : भारत, चीन और पाकिस्तान के बीच पहले से मौजूद रणनीतिक तनाव के बीच पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए के नए रक्षा समझौते ने क्षेत्रीय समीकरण को और जटिल कर दिया है। रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए इस समझौते का महत्व सिर्फ इस बात में नहीं है कि इसके प्रावधान कब लागू होंगे, बल्कि यह भी है कि इससे पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन किस तरह बदलता है।
भारत, चीन और पाकिस्तान तीनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। ऐसे में किसी नए सुरक्षा गठजोड़ के उभरने से क्षेत्र में संकट प्रबंधन और परमाणु प्रतिरोध की गणना और जटिल हो सकती है।
सऊदी की पूंजी, तुर्किए की तकनीक और पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति
रणनीतिक विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी के मुताबिक, यह समझौता एक ऐसा त्रिपक्षीय ढांचा तैयार करता है, जिसमें सऊदी अरब की आर्थिक क्षमता, तुर्किए की रक्षा तकनीक और पाकिस्तान की रणनीतिक भौगोलिक स्थिति एक साथ आती है। उनका कहना है कि भले ही समझौते के सामूहिक रक्षा प्रावधानों को कभी लागू करने की स्थिति न आए, लेकिन इसके अस्तित्व मात्र से भारत की रणनीतिक गणना प्रभावित हो सकती है। इससे संभावित संकट की योजना बनाने और प्रतिरोध की रणनीति तैयार करने में अनिश्चितता बढ़ सकती है।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की स्थिति मजबूत होने का दावा
ब्रह्मा चेलानी ने यह भी तर्क दिया कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत द्वारा साढ़े तीन दिन में सैन्य कार्रवाई रोकने के फैसले से पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि को खासकर इस्लामी दुनिया में दोबारा मजबूत होने का अवसर मिला। उनके मुताबिक, इससे पाकिस्तान का रणनीतिक महत्व बढ़ा और सऊदी अरब के साथ उसके रक्षा संबंधों को मजबूती मिली, जिसे अब तुर्किए की भागीदारी से और विस्तार मिला है।
इस समझौते से पाकिस्तान को तुर्किए से सैन्य तकनीक और रक्षा उपकरणों तक बेहतर पहुंच मिलने की संभावना भी जताई जा रही है। साथ ही, चीन के साथ पाकिस्तान की पहले से मजबूत रणनीतिक साझेदारी के कारण उसका कूटनीतिक प्रभाव और बढ़ सकता है।
‘पाकिस्तान का हौसला बढ़ेगा’
न्यूयॉर्क स्थित एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट की फरवा आमिर के अनुसार, यह समझौता पाकिस्तान को व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे में और गहराई से जोड़ता है। उनका मानना है कि इससे पाकिस्तान का आत्मविश्वास बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि चीन के हित में भी यह है कि पाकिस्तान अपेक्षाकृत सुरक्षित और स्थिर स्थिति में रहे, क्योंकि दोनों देशों के बीच पहले से गहरे रणनीतिक और रक्षा संबंध हैं।
भारत को पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका से निपटना होगा
भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल का मानना है कि भारत को अब उन क्षेत्रों में पाकिस्तान की बढ़ती राजनीतिक और सुरक्षा भूमिका से निपटना होगा, जहां भारत के महत्वपूर्ण हित जुड़े हैं। उनके मुताबिक, नया रक्षा समझौता पाकिस्तान को भारत के खिलाफ अपनी आक्रामक कूटनीति आगे बढ़ाने के लिए और प्रोत्साहित कर सकता है। उन्होंने यह आशंका भी जताई कि इससे आतंकवाद के मोर्चे पर पाकिस्तान की ओर से जोखिम बढ़ सकता है।
चीन-पाकिस्तान समीकरण से बढ़ सकती है चुनौती
थॉम्पसन रिवर्स यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता सायरा बानो ने अपने विश्लेषण में कहा कि पाकिस्तान को अब ऐसे दो देशों के साथ औपचारिक सुरक्षा ढांचा मिला है, जिनके पास बड़े वित्तीय संसाधन, तकनीकी क्षमता और कूटनीतिक प्रभाव है। उनके अनुसार, यह व्यवस्था चीन के साथ पाकिस्तान के पहले से गहरे रणनीतिक और रक्षा संबंधों के साथ मिलकर दक्षिण एशिया के सुरक्षा समीकरण को बदल सकती है। भारत के लिए चुनौती अब केवल भारत-पाकिस्तान के द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि यह व्यापक गठबंधन नेटवर्क का हिस्सा बन सकती है।
खाड़ी की सुरक्षा से दक्षिण एशिया तक पहुंचा असर
दक्षिण एशियाई सुरक्षा मामलों की विशेषज्ञ साइमा अफजल के मुताबिक, पाकिस्तान की भागीदारी से खाड़ी क्षेत्र पर केंद्रित सुरक्षा नेटवर्क का प्रभाव भारत-पाकिस्तान प्रतिद्वंद्विता, चीन की क्षेत्रीय भूमिका और परमाणु प्रतिरोध तक पहुंच गया है। इस तरह पाकिस्तान-सऊदी-तुर्किए रक्षा समझौता केवल तीन देशों के बीच सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसके संभावित प्रभाव दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया के व्यापक रणनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकते हैं।
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