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इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला — 18 साल पूरे होते ही बेटा पिता से भरण-पोषण का हकदार नहीं, पत्नी का गुजारा-भत्ता रहेगा जारी

Published on: January 21, 2026
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जागृत | प्रयागराज(Prayagraj): इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाले फैसले में स्पष्ट किया है कि बेटा 18 वर्ष की आयु पूरी कर लेने के बाद पिता से भरण-पोषण का अधिकार नहीं रखता। इस आधार पर हाईकोर्ट ने बेटे के पक्ष में परिवार न्यायालय द्वारा जारी भरण-पोषण के आदेश को रद्द कर दिया। हालांकि, पत्नी के लिए बढ़ाई गई भरण-पोषण राशि को कोर्ट ने उचित मानते हुए बरकरार रखा। यह फैसला न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ला की एकल पीठ ने मोअज्जम अली द्वारा दायर याचिका पर सुनाया।


परिवार न्यायालय के आदेश को हाईकोर्ट में दी गई थी चुनौती

याची पति मोअज्जम अली ने परिवार न्यायालय भदोही के 4 अगस्त 2023 के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। परिवार न्यायालय ने पत्नी और बेटे के पक्ष में भरण-पोषण की राशि में वृद्धि की थी।

परिवार न्यायालय के आदेश के अनुसार:

  • पत्नी के लिए भरण-पोषण राशि 1,000 रुपये से बढ़ाकर 6,000 रुपये प्रतिमाह

  • बेटे के लिए भरण-पोषण राशि 500 रुपये से बढ़ाकर 4,000 रुपये प्रतिमाह कर दी गई थी


याची पति की दलीलें

याची की ओर से अदालत में दलील दी गई कि:

  • परिवार न्यायालय से उन्हें कानूनी प्रक्रिया के अनुसार कोई नोटिस या समन प्राप्त नहीं हुआ

  • बेटे का जन्म प्रमाणपत्र प्रस्तुत करते हुए कहा गया कि वह 5 जनवरी 2023 को ही 18 वर्ष का हो चुका था, यानी बालिग है

  • ऐसे में बेटे के लिए भरण-पोषण का आदेश कानूनन अवैध है

  • याची पर पहले से ही पांच बच्चों की जिम्मेदारी है

  • इतनी अधिक बढ़ाई गई राशि का भुगतान करना उसकी आर्थिक क्षमता से बाहर है


हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि:

  • बेटा वास्तव में बालिग हो चुका है

  • इसलिए उसके पक्ष में जारी भरण-पोषण आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है

इसी आधार पर कोर्ट ने बेटे के लिए भरण-पोषण का आदेश रद्द कर दिया।


पत्नी के लिए 6,000 रुपये भरण-पोषण बरकरार

हालांकि, कोर्ट ने पत्नी के लिए बढ़ाई गई 6,000 रुपये प्रतिमाह की राशि को लेकर कहा कि:

  • वर्तमान समय की महंगाई को देखते हुए यह राशि अत्यधिक नहीं है

  • पति अपनी आय के स्रोतों और वास्तविक आर्थिक स्थिति से जुड़े कोई ठोस प्रमाण अदालत के समक्ष पेश नहीं कर सका

  • केवल मौखिक दलीलों के आधार पर असमर्थता स्वीकार नहीं की जा सकती

इस आधार पर हाईकोर्ट ने पत्नी के लिए भरण-पोषण राशि को बरकरार रखा और याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निस्तारित कर दिया।


आय का विवरण छिपाने पर पति को नहीं मिली राहत

इसी क्रम में एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े मामलों में पति की जिम्मेदारी को लेकर कड़ा रुख अपनाया। न्यायमूर्ति गरिमा प्रशांत की एकल पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि पति अपनी आय और संपत्ति का हलफनामा दाखिल नहीं करता, तो अदालत उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष (Adverse Inference) निकाल सकती है।


पीलीभीत का मामला: पत्नी को मिला अंतरिम गुजारा-भत्ता

यह मामला पीलीभीत निवासी श्याम लाल से जुड़ा है। उनकी पत्नी ने परिवार न्यायालय में गुजारा-भत्ता की मांग को लेकर याचिका दायर की थी। मामले के प्रमुख तथ्य:

  • विवाह की तारीख: 14 जून 2020

  • पत्नी का आरोप: दहेज की मांग के कारण 14 मार्च 2022 को ससुराल से निकाला गया

  • इसके बाद से वह मायके में रह रही हैं

  • पति द्वारा कोई भरण-पोषण नहीं दिया जा रहा था

परिवार न्यायालय ने 12 अगस्त 2024 को पति को 3,500 रुपये प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया था।


हाईकोर्ट ने पति की याचिका की खारिज

श्याम लाल ने इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने:

  • परिवार न्यायालय के आदेश को सही और उचित ठहराया

  • पति की याचिका को खारिज कर दिया

कोर्ट ने साफ किया कि भरण-पोषण के मामलों में आय छिपाने वाले पति को कोई राहत नहीं दी जा सकती

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