जागृत भारत,काठमांडू : नेपाल के विदेश मंत्री के हालिया चीन और भारत दौरे के बाद एक बार फिर नेपाल में चीन की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं और उसके प्रभाव को लेकर चर्चा तेज हो गई है। चीन लगातार नेपाल के साथ बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन हिमालयी भूगोल और प्राकृतिक चुनौतियां उसके कई सपनों के रास्ते में बड़ी बाधा बनी हुई हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन ने नेपाल को कई बड़े आर्थिक और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के वादे किए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षित प्रगति नहीं हो पाई है। चीन द्वारा नेपाल सीमा पर विकसित किए गए कई ड्राई पोर्ट भूस्खलन और खराब मौसम के कारण अक्सर प्रभावित रहते हैं, जिससे व्यापारिक गतिविधियों पर असर पड़ता है।
इसके विपरीत भारत ने नेपाल के साथ सड़क, रेल और व्यापारिक संपर्क को लगातार मजबूत किया है। भारत-नेपाल सीमा तक रेल संपर्क बढ़ाया गया है और दोनों देशों के बीच कई मार्गों से व्यापक व्यापार हो रहा है। साथ ही बड़ी संख्या में भारतीय पर्यटक भी नेपाल का रुख कर रहे हैं, जिससे वहां की अर्थव्यवस्था को लाभ मिल रहा है।
चीन ने नेपाल में कई परियोजनाओं में निवेश किया है, जिनमें पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा भी शामिल है। हालांकि, नेपाल और चीन के बीच व्यापार मुख्य रूप से कुछ सीमित पर्वतीय मार्गों पर निर्भर है। तोतापानी बॉर्डर ऐसा ही एक महत्वपूर्ण मार्ग है, जो 2015 के विनाशकारी भूकंप के बाद करीब चार वर्षों तक बंद रहा था। वर्तमान में भी अरानिको हाईवे पर बार-बार होने वाले भूस्खलन से यातायात और व्यापार प्रभावित होता रहता है।
चीन की महत्वाकांक्षी केरुंग-काठमांडू रेलवे परियोजना भी कई चुनौतियों से घिरी हुई है। प्रस्तावित रेल मार्ग का लगभग 98.5 प्रतिशत हिस्सा सुरंगों और पुलों के जरिए बनाना होगा। भूकंप संभावित क्षेत्र में स्थित इस परियोजना की अनुमानित लागत 2.75 अरब डॉलर या उससे अधिक बताई जा रही है। परियोजना का सर्वेक्षण अभी जारी है।
दूसरी ओर भारत रक्सौल-काठमांडू रेल परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार कर चुका है। व्यापार के क्षेत्र में भी चीन के कई उत्पाद नेपाल तक भारत के कोलकाता और विशाखापत्तनम बंदरगाहों के जरिए पहुंच रहे हैं, जो अपेक्षाकृत सस्ता और सुविधाजनक विकल्प साबित हो रहा है।
नेपाल ने 2015 में BRI पहल में शामिल होकर भारत पर अपनी निर्भरता कम करने की रणनीति अपनाई थी। लेकिन सीमा क्षेत्रों में बाढ़, भूस्खलन और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण कई योजनाएं अपेक्षित गति नहीं पकड़ सकीं। परिणामस्वरूप नेपाल को अपनी आपूर्ति और व्यापारिक जरूरतों के लिए एक बार फिर भारत के बीरगंज, कोलकाता और विशाखापत्तनम मार्गों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है, लेकिन हिमालयी भूगोल और क्षेत्र की प्राकृतिक चुनौतियां उसकी कई रणनीतिक और आर्थिक योजनाओं के सामने बड़ी रुकावट बनी हुई हैं।
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