जागृत भारत | नई दिल्ली(New Delhi): सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार (25 नवंबर 2025) को हुई सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने कहा कि समाज को किसी भी स्थिति में जातिगत आधार पर विभाजित नहीं होने दिया जाना चाहिए। यह टिप्पणी उस वक्त आई जब वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने केंद्र सरकार द्वारा घोषित जाति जनगणना का मुद्दा उठाया।
इंदिरा जयसिंह ने उठाया जाति जनगणना का मुद्दा
जयसिंह ने बताया कि
1931 के बाद कोई जाति जनगणना नहीं हुई,
केंद्र सरकार ने मार्च 2027 में प्रस्तावित जनगणना में जाति-आधारित आंकड़े शामिल करने की घोषणा की है,
यह जानकारी भाग IX (ग्रामीण स्थानीय स्वशासन) के तहत ओबीसी राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए आवश्यक है।
महाराष्ट्र में OBC आरक्षण पर सुनवाई
सुनवाई में महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण का मुद्दा केंद्र में रहा। दलील दी गई कि
288 नगर परिषदों और नगर पंचायतों में से 57 सीटों पर आरक्षण संविधान द्वारा निर्धारित 50% की अधिकतम सीमा से अधिक हो रहा है।
महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयोग ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया।
कोर्ट ने कहा—चुनाव होंगे, लेकिन शर्तों के साथ
CJI ने कहा कि
चुनाव 2 दिसंबर को निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार होंगे,
लेकिन इन 57 सीटों के परिणाम मौजूदा कार्यवाही के अधीन रहेंगे,
आगे से आयोग को 50% की सीमा का कड़ाई से पालन करना होगा।
स्थानीय निकाय चुनाव दो वर्षों से रुके
महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव 2022 से रुके हुए हैं, क्योंकि ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामलों में लगातार मुकदमेबाज़ी चल रही है। CJI ने स्पष्ट किया कि जनता को प्रतिनिधि न मिलने की समस्या खत्म करनी होगी, क्योंकि कई निकाय वर्तमान में ब्यूरोक्रेट्स के सहारे चल रहे हैं।
27% OBC कोटा और बढ़ती आरक्षण सीमा पर बहस
वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह, याचिकाकर्ताओं की तरफ से, बोले कि यदि चुनाव 2022 JK बंठिया कमीशन की सिफारिशों पर हुए तो ओबीसी को 27% कोटा मिलेगा और कुल आरक्षण 70% तक पहुंच जाएगा।
वहीं इंदिरा जयसिंह का कहना था कि ओबीसी समुदाय को उनकी जनसंख्या के अनुसार राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलना जरूरी है।
CJI: “संतुलन ज़रूरी, सभी को न्याय मिले”
CJI ने कहा कि
ओबीसी को राजनीतिक हिस्सेदारी जरूर मिलनी चाहिए,
लेकिन यह भी देखना होगा कि क्या इससे अन्य समुदाय पूरी तरह बाहर तो नहीं हो जाते,
चुनावी आरक्षण में संतुलन बनाना जरूरी है।
उन्होंने यह भी कहा कि अदालत यह देखेगी कि क्या इस पूरे मुद्दे को संविधान पीठ को भेजा जाना चाहिए और क्या सेवा क्षेत्र (service jurisprudence) के सिद्धांत चुनावी आरक्षण पर लागू हो सकते हैं।
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