जागृत भारत | लखनऊ(Lucknow): उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों में जुटी कांग्रेस को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। उनके इस फैसले से यूपी कांग्रेस के संगठन और चुनावी रणनीति को बड़ा नुकसान माना जा रहा है।
पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, प्रदेश अध्यक्ष अजय राय समेत पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को अपना इस्तीफा भेज दिया है। इस्तीफे में उनके साथ 73 नेताओं और समर्थकों के नाम शामिल हैं।
इस्तीफे में कई बड़े नेताओं के नाम शामिल
नसीमुद्दीन सिद्दीकी के साथ पार्टी छोड़ने वालों में पूर्व विधायक फरहत हसन उर्फ हाजी शब्बन, पूर्व विधायक राम जियावन, पूर्व एमएलसी हुस्ना सिद्दीकी समेत कई प्रमुख नेता शामिल हैं। इसके अलावा पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष, पंचायत अध्यक्ष और लोकसभा व विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी रह चुके कई स्थानीय नेता भी कांग्रेस से अलग हो गए हैं।
अगले सप्ताह नई राजनीतिक रणनीति का ऐलान
पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा है कि वह अगले सप्ताह अपनी नई राजनीतिक रणनीति का खुलासा करेंगे। उन्होंने संकेत दिया कि आगे की सियासी दिशा तय करने के लिए समर्थकों और सहयोगियों के साथ विचार-विमर्श चल रहा है।
कांग्रेस नेतृत्व से कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं
अमर उजाला से बातचीत में नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा कि उन्हें कांग्रेस के किसी नेता से व्यक्तिगत शिकायत नहीं है। उन्होंने कहा कि वह दलितों और अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के उद्देश्य से कांग्रेस में शामिल हुए थे।
हालांकि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में उन्हें यह नहीं लगता कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस में फासीवादी ताकतों से लड़ने की पर्याप्त क्षमता दिखाई दे रही है। इसी कारण उन्होंने अपने समर्थकों के साथ अलग राजनीतिक रास्ता चुनने का निर्णय लिया है।
राजनीतिक सफर: बसपा से कांग्रेस तक
नसीमुद्दीन सिद्दीकी का राजनीतिक सफर वर्ष 1988 में बांदा नगर पालिका अध्यक्ष के रूप में शुरू हुआ था। इसके बाद वह 1991 में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से विधायक बने और तेजी से राजनीति में उभरे।
वह बसपा सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे और लंबे समय तक पार्टी के प्रमुख दलित और अल्पसंख्यक चेहरे के रूप में जाने जाते थे। बाद में बसपा प्रमुख मायावती से मतभेद के चलते उनका पार्टी से अलगाव हुआ। फरवरी 2018 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी का दामन थामा था और उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश की संगठनात्मक जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
आजाद समाज पार्टी या किसी अन्य दल से जुड़ने की चर्चा
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अभी किसी भी राजनीतिक दल में शामिल होने की औपचारिक घोषणा नहीं की है। हालांकि राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि वह आजाद समाज पार्टी के साथ नई राजनीतिक पारी शुरू कर सकते हैं। बताया जा रहा है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और सांसद चंद्रशेखर के साथ उनकी कई दौर की बातचीत हो चुकी है, हालांकि पार्टी में उनकी भूमिका अभी तय नहीं हुई है।
सूत्रों के अनुसार नसीमुद्दीन सिद्दीकी अन्य विपक्षी दलों के साथ भी संवाद कर रहे हैं। इस पर उन्होंने कहा कि वह वहीं जाएंगे, जहां दलितों और अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा होगी और बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर तथा कांशीराम के सपनों को पूरा करने का अवसर मिलेगा।
यूपी राजनीति में असर और कांग्रेस को चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी का कांग्रेस छोड़ना यूपी विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के लिए बड़ा झटका है। खासकर दलित और अल्पसंख्यक वोट बैंक पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। यह घटनाक्रम उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई सियासी हलचल पैदा कर सकता है और विपक्षी दलों के समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है।
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