जागृत भारत | कुशीनगर(Kushinagar): उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले से इंसानियत और व्यवस्था को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। यहां 75 वर्षीय बुजुर्ग हरिवंश पिछले एक दशक से खुद को “जिंदा” साबित करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि न्यायालय से जीवित होने का आदेश मिलने के बावजूद वे आज भी सरकारी अभिलेखों में मृत घोषित हैं।
अपनों ने दिया धोखा
जानकारी के अनुसार, हरिवंश रोज़ी-रोटी के सिलसिले में असम में रहते थे। उनकी गैरमौजूदगी का फायदा उठाकर पट्टीदारों ने कथित तौर पर उन्हें मृत घोषित करवा दिया और उनकी जमीन अपने नाम दर्ज करा ली। जब हरिवंश गांव लौटे तो उन्हें पता चला कि वे कागजों में पहले ही “मर चुके” हैं।
10 साल से जारी संघर्ष
अपने हक और अस्तित्व को साबित करने के लिए हरिवंश बीते 10 वर्षों से तहसील, राजस्व कार्यालय और अन्य विभागों के चक्कर काट रहे हैं। हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन मिला, लेकिन रिकॉर्ड में सुधार नहीं हुआ।
कोर्ट ने माना जिंदा, सिस्टम ने नहीं
करीब दो महीने पहले न्यायालय ने हरिवंश को जीवित मानते हुए उनके पक्ष में फैसला दिया। इसके बावजूद तहसील प्रशासन ने अब तक राजस्व रिकॉर्ड (खतौनी) में आवश्यक संशोधन नहीं किया है। नतीजा यह है कि कोर्ट के आदेश के बाद भी वे सरकारी कागजों में मृत ही दर्ज हैं।
बुजुर्ग का दर्द
हरिवंश का कहना है,
“मैं गरीब आदमी हूं, इसलिए मेरी कोई नहीं सुन रहा। कोर्ट ने जिंदा मान लिया, लेकिन साहब लोग मुझे कागजों में जिंदा नहीं कर रहे। जब कागजों में ही मर चुका हूं तो हक कहां से मिलेगा?”
प्रशासन का पक्ष
इस मामले में तहसीलदार महेश कुमार ने कहा कि प्रकरण उनके संज्ञान में नहीं है। उन्होंने आश्वासन दिया कि मामले की जांच कराकर शीघ्र आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
यह मामला न केवल सरकारी व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर करता है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करता है कि जब अदालत का आदेश भी फाइलों में दब जाए, तो आम आदमी आखिर न्याय के लिए कहां जाए।
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1 thought on ““साहब, मैं अभी ज़िंदा हूँ!” सिस्टम की मार और अपनों के धोखे ने बुजुर्ग को काग़ज़ों में मार डाला”