जागृत भारत | फतेहपुर(Fatehpur): उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में स्थित आबूनगर रेडइया के बहुचर्चित मंदिर–मकबरा विवाद में फिलहाल समाधान के लिए इंतजार और बढ़ गया है। अदालत में चल रहे इस मामले की अगली सुनवाई अब 22 दिसंबर को होगी। सोमवार को सिविल जज सीनियर डिवीजन की कोर्ट नहीं बैठने के कारण यह तारीख तय की गई।
हालांकि सुनवाई टलने के बावजूद दोनों पक्षों के लोग कचहरी परिसर में मौजूद रहे। किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए प्रशासन ने अतिरिक्त पुलिस बल तैनात रखा।
जिला जज की अदालत में भी 17 दिसंबर को सुनवाई तय
इस मामले में एक और महत्वपूर्ण मोड़ यह है कि मूल मुकदमे में सुनवाई के आदेश के खिलाफ मकबरा पक्ष ने जिला जज की अदालत में अपील दायर की है, जिस पर 17 दिसंबर को सुनवाई प्रस्तावित है। यानी 17 दिसंबर को जिला जज की कोर्ट और 22 दिसंबर को सिविल जज की कोर्ट में यह मामला सुर्खियों में रहेगा।
2010 से चला आ रहा है भूमि और स्वामित्व का विवाद
यह विवाद लगभग 18 वर्षों से न्यायालय में लंबित है। वर्ष 2010 में सिविल जज सीनियर डिवीजन ने निर्णय देते हुए असोथर निवासी रामनरेश सिंह के नाम दर्ज भूमि को खारिज कर दिया था और उक्त भूमि पर मकबरा मंगी का नाम दर्ज करने का आदेश दिया गया था। इसके आधार पर वर्ष 2012 में खतौनी में रामनरेश सिंह का नाम हटाकर मकबरा मंगी का नाम दर्ज कर दिया गया।
रेस्टोरेशन और अपील से उलझता गया मामला
रामनरेश सिंह ने इस फैसले के खिलाफ 2011 में रेस्टोरेशन (पुनः सुनवाई) याचिका दायर की, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद 2014 में एडीजे कोर्ट में अपील दायर की गई, जिसे स्वीकार करते हुए मामला फिर से सिविल जज सीनियर डिवीजन को सुनवाई के लिए भेजा गया।
पिछली सुनवाइयों में वादी पक्ष ने रेस्टोरेशन मुकदमे में नए मुतवल्ली को पक्षकार बनाए जाने के बाद मूल मुकदमे में सुनवाई की मांग की, जिसे कोर्ट ने पांच हजार रुपये का जुर्माना लगाते हुए स्वीकार कर लिया।
मकबरा पक्ष ने फैसले को बताया गलत, जिला जज में दायर की अपील
मकबरा पक्ष के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि 15 साल बाद मूल मुकदमे में दोबारा सुनवाई न्यायसंगत नहीं है। इसी आधार पर उन्होंने जिला जज के समक्ष अपील दायर की, जिसकी सुनवाई 17 दिसंबर को होनी है।
11 अगस्त को विवादित स्थल पर हुआ था बवाल
इस विवाद ने 11 अगस्त 2025 को हिंसक रूप ले लिया था। आबूनगर स्थित पुरानी इमारत को लेकर मठ–मंदिर संरक्षण संघर्ष समिति ने इसे मंदिर बताते हुए पूजा की अनुमति मांगी थी। प्रशासन की अनुमति न मिलने पर सैकड़ों लोगों ने मौके पर पहुंचकर पूजा-अर्चना की और वहां बनी मजारों में तोड़फोड़ कर दी।
इसके बाद दोनों समुदायों के बीच ईंट-पत्थर चले और कई घंटे तक बवाल चलता रहा। पुलिस ने लाठीचार्ज कर स्थिति को नियंत्रित किया और मौके को छावनी में तब्दील कर दिया।
प्रशासन ने विवादित क्षेत्र को किया सील
घटना के बाद विवादित स्थल के एक किलोमीटर क्षेत्र को सील कर दिया गया।
कई स्तरों की बैरिकेडिंग
पीएसी और पुलिस बल की तैनाती
अस्थायी पुलिस चौकी की स्थापना
की गई। वहीं रातों-रात टूटी मजारों की मरम्मत भी कराई गई।
हाईकोर्ट और प्रशासनिक जांच का भी रहा है दखल
मकबरा पक्ष के मुतवल्ली की ओर से 2013 में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसमें मकबरे को 1611 में निर्मित बताया गया। हाईकोर्ट के आदेश पर तत्कालीन डीएम द्वारा कराई गई जांच में यह पाया गया कि 2012 में ही मकबरा मंगी का नाम खतौनी में दर्ज किया जा चुका था।
अब आगे क्या?
17 दिसंबर: जिला जज की कोर्ट में अपील पर सुनवाई
22 दिसंबर: सिविल जज सीनियर डिवीजन की कोर्ट में मूल मुकदमे की सुनवाई
इस केस का फैसला न सिर्फ फतेहपुर बल्कि पूरे प्रदेश में धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों के लिए नजीर बन सकता है।
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