जागृत भारत | गोरखपुर(Gorakhpur): गोरखपुर शहर में विकास की बयार चली है, लेकिन इस विकास की कीमत कुछ परिवारों को अपनी तीन दशक की रोजी-रोटी कुर्बान करके चुकानी पड़ रही है। नगर निगम ने कचहरी बस स्टैंड के पास अपनी दुकानों को खाली करने के लिए दुकानदारों को सिर्फ तीन दिन का अल्टीमेटम दिया है। यह फरमान उन 38 व्यापारियों के लिए वज्रपात जैसा है, जिनकी पीढ़ियां इन छोटी दुकानों के सहारे चलती आई हैं। सीएम ग्रिड सड़क निर्माण परियोजना के तहत सड़क चौड़ीकरण की योजना ने इन दुकानदारों के सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा कर दिया है, क्योंकि वैकल्पिक व्यवस्था के नाम पर उनके पास कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं है।
33 वर्षों का ठिकाना छोड़ने को मजबूर 38 परिवार
गोरखपुर के कचहरी बस स्टैंड के पास स्थित इन दुकानों पर करीब 33 वर्षों से 38 परिवार निर्भर थे। ये सभी दुकानदार नगर निगम को नियमित रूप से किराया देते आ रहे थे और इस स्थान पर उनका एक मजबूत ग्राहक आधार बन चुका था। अब, सीएम ग्रिड सड़क चौड़ीकरण के लिए सड़क की जद में आने के कारण, निगम ने इन्हें तुरंत दुकान खाली करने का नोटिस थमा दिया है। इस फैसले ने दशकों से स्थापित इन व्यापारियों के जीवन को एक झटके में अस्थिर कर दिया है।
विरोध प्रदर्शन और पुनर्वास की मांग
निगम के इस अचानक और कठोर कदम के विरोध में, प्रभावित दुकानदारों ने अब धरना प्रदर्शन का रास्ता अपनाया है। उनकी मुख्य मांगें हैं:
- इस फैसले को तुरंत वापस लिया जाए।
- दुकानदारों का उचित और स्थायी पुनर्वास किया जाए।
- सीएम ग्रिड सड़क चौड़ीकरण की योजना में, छात्रसंघ चौराहा से आंबेडकर चौराहा तक की सड़क की चौड़ाई को भी 18 मीटर तक सीमित रखा जाए, जैसा कि शास्त्री चौराहा तक की सड़क के लिए किया गया है।
दुकानदारों का तर्क है कि अगर सड़क की चौड़ाई को इस हिस्से में भी 18 मीटर रखा जाता है, तो किसी भी दुकानदार को विस्थापित नहीं होना पड़ेगा और विकास का काम भी जारी रहेगा।
नम आँखों से व्यापारियों का दर्द
प्रभावित दुकानदारों में बृज किशोर सिंह, नीरज सिंह, शिवराम शर्मा, प्रियरंजन मिश्र जैसे कई नाम शामिल हैं, जो लंबे समय से किराएदार हैं। एक बुजुर्ग दुकानदार ने दर्द बयाँ करते हुए कहा, “हमने अपनी पूरी जिंदगी इसी दुकान के भरोसे काट दी। अब इस उम्र में न तो कोई दूसरा हुनर है, न ही आय का कोई और स्रोत। इस उम्र में हम कहाँ जाएँगे?”
एक अन्य प्रभावित, सुबोध कुमार मिश्रा, जिन्होंने 1993 में यहाँ अपनी किताब की दुकान खोली थी, कहते हैं कि अब आगे का जीवन कैसे चलेगा, यह सोचकर उनकी रातों की नींद उड़ गई है। वहीं, अभिषेक मणि त्रिपाठी ने लीज का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जब निगम ने 99 साल की लीज पर दुकान आवंटित की थी, तो अब उजाड़ने से पहले उनके पुनर्वास के बारे में भी सोचना चाहिए।
यह घटना दिखाती है कि कैसे विकास परियोजनाओं और दशकों पुरानी आजीविका के बीच टकराव की स्थिति पैदा होती है। 38 परिवारों की उम्मीदें अब जिला प्रशासन और नगर निगम के अगले कदम पर टिकी हैं। दुकानदारों की मांग केवल दुकान न उजाड़ने की नहीं है, बल्कि स्थायी पुनर्वास और सड़क चौड़ीकरण की योजना में तार्किक बदलाव की है, जिससे विकास भी हो और कोई परिवार अपनी रोजी-रोटी से वंचित न हो। प्रशासन को चाहिए कि वह मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए इन परिवारों के लिए जल्द से जल्द कोई स्थायी समाधान निकाले।
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