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भारत में मानवाधिकार: संवैधानिक अधिकार, चुनौतियाँ और सुधार की दिशा

Published on: September 18, 2025
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भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहाँ नागरिकों को उनके मौलिक अधिकार संविधान द्वारा प्रदान किए गए हैं। इनमें जीवन, स्वतंत्रता, समानता और गरिमा का अधिकार शामिल है। इन अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और राज्य स्तर पर आयोग कार्यरत हैं। इसके बावजूद मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं।

मानवाधिकारों का संवैधानिक आधार

भारतीय संविधान के भाग-3 (मौलिक अधिकार) और भाग-4 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) मानवाधिकारों की नींव रखते हैं।

  • अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता

  • अनुच्छेद 19: अभिव्यक्ति और विचार की स्वतंत्रता

  • अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार

  • अनुच्छेद 23 और 24: मानव तस्करी और बाल श्रम पर रोक

चुनौतियाँ

भारत में मानवाधिकारों की रक्षा के प्रयासों के बावजूद कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं।

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक और पत्रकारों पर कार्रवाई।

  • महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार के मामले।

  • अल्पसंख्यक और दलित समुदायों के साथ भेदभाव की घटनाएँ।

  • पुलिस की ज्यादती और हिरासत में मौतें

  • इंटरनेट शटडाउन और विरोध प्रदर्शनों पर अंकुश।

सरकार और संस्थाओं की भूमिका

सरकार का कहना है कि वह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार कदम उठा रही है।

  • मानव तस्करी रोकथाम, महिला सुरक्षा और अनुसूचित जाति/जनजाति सुरक्षा के लिए विशेष कानून बनाए गए हैं।

  • NHRC और राज्य मानवाधिकार आयोग नागरिकों की शिकायतों पर स्वत: संज्ञान लेते हैं।

  • शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार योजनाओं के जरिए बुनियादी अधिकारों को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है।

विशेषज्ञों की राय

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि भारत में कानून तो मजबूत हैं लेकिन उनके प्रभावी क्रियान्वयन की कमी है। इसके लिए पारदर्शिता, जवाबदेही और स्वतंत्र न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका जरूरी है।

आगे का रास्ता

विशेषज्ञों का कहना है कि मानवाधिकारों की रक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि इसमें नागरिक समाज, मीडिया और आम जनता की भी अहम भूमिका है। जागरूकता अभियान, शिक्षा का प्रसार और तकनीक के जरिए पारदर्शिता बढ़ाकर भारत अपने लोकतांत्रिक मूल्यों को और मजबूत बना सकता है।

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